बीमा तो बढ़ा, लेकिन इलाज का बोझ क्यों नहीं घटा?

भारत के स्वास्थ्य बजट पर एक अजीब विरोधाभास छाया है: जहां insurance की पहुंच आम आदमी तक पहुंच गई है, वहीं उसकी जेब पर medical खर्च का बोझ लगातार बढ़ रहा है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि 2017-18 में महज 7.5% लोगों में illness दर्ज की गईं, जो अब बढ़कर 13.1% हो गई हैं। यह उछाल मुख्य रूप से क्रॉनिक बीमारियों—जैसे diabetes और कार्डियोवैस्कुलर रोगों—के दो से तीन गुना बढ़ने के कारण है। हालांकि infection के मामले कम हुए हैं, लेकिन लंबे समय तक चलने वाले treatment ने परिवारों के बजट पर भारी दबाव डाला है।

इस बीच, rural इलाकों में बीमा पहुंच 14.1% से बढ़कर 47.4% हो गई है, जबकि urban इलाकों में यह 19.1% से बढ़कर 44.3% पहुंची। लेकिन यह बढ़ावा अभी भी काफी नहीं है, क्योंकि हॉस्पिटलाइजेशन के दौरान औसत आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च ₹34,064 तक पहुंच गया है। लोग private अस्पतालों को तरजीह दे रहे हैं—शहरी क्षेत्रों में 50.8% प्रसव और ग्रामीण में 28.8% यहीं हो रहे हैं—सरकारी facilities पर भरोसा कम होने के कारण। इससे medical बिल आग की तरह बढ़ रहे हैं।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि जो लोग सबसे ज्यादा जोखिम में हैं—छोटे शिशु और 60 साल से अधिक उम्र के बुजुर्ग—उनके लिए insurance सबसे कम है। शिशुओं के लिए यह लगभग दुर्लभ है, और बुजुर्गों के लिए यह या तो उपलब्ध नहीं या अत्यधिक महंगा है। इसके बावजूद, 'आयुष्मान भारत' जैसी schemes के विस्तार के बाद भी यह अंतर बना हुआ है। यह न केवल financial बल्कि emotional दोहन भी है।

सरकार ने 2026-27 के बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए रिकॉर्ड ₹1,06,530 करोड़ का प्रावधान किया है, जो previous वर्ष की तुलना में 10% अधिक है। इसके साथ, बीमा कानून में संशोधन के जरिए foreign निवेश (FDI) की सीमा 100% तक बढ़ाई गई है। इसके अलावा, नियामक दिशानिर्देशों में सुधार, विलय और अधिग्रहण के नियमों में स्पष्टता और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए Ind AS 117 जैसे accounting मानक लागू किए जा रहे हैं। ये कदम market में अधिक प्रतिस्पर्धा और नवाचार की उम्मीद जगा रहे हैं।

हालांकि, investment के बावजूद, आम आदमी तक स्वास्थ्य सेवाओं की access सुनिश्चित नहीं हो पाई है। Nifty Healthcare Index का P/E 37.0 और BSE Healthcare Index का 38.8 है, जो growth की उम्मीद दिखाता है, लेकिन यह sector अक्सर उच्च लागत वाले private सेवाओं पर निर्भर रहता है। परिवार अभी भी बच्चे के जन्म पर औसतन ₹14,775 और आउटपेशेंट इलाज पर ₹861 खर्च कर रहे हैं। बीमा केवल आंशिक relief दे पा रहा है—और यही वास्तविकता है।

प्रतिक्रियाएँ 8

  • नमन_राज

    बीमारी तो बढ़ी ही है, डिटेक्शन भी बेहतर हो रहा है। पर सवाल ये है कि क्या इंश्योरेंस असली मदद कर रहा है?

  • सुधा_मिश्रा

    मेरे पिता के लिए बीमा लेना इतना महंगा है कि लगता है बिना बीमार हुए ही जेब खाली हो जाएगी।

  • दीपक_सिंह

    सरकारी अस्पतालों में staff की कमी और उपकरणों की दुर्दशा देखकर कोई प्राइवेट क्यों न चुने?

  • अरुण_कुमार

    FDI बढ़ने से अच्छी तकनीक आएगी, लेकिन क्या वो सस्ती होगी? इनोवेशन का फायदा आम आदमी तक पहुंचेगा?

  • प्रियंका_जी

    एक शिशु के लिए बीमा न मिलना तो पूरी व्यवस्था की विफलता है।

  • विकास_पांडे

    बजट में पैसा तो बढ़ा, लेकिन क्रियान्वयन कहां है? बुनियादी ढांचा अभी भी टूटा हुआ है।

  • रिया_एस

    हर कोई बीमा बाजार की बात करता है, लेकिन आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च क्यों नहीं गिर रहा?

  • मयंक_टी

    मार्केट कैप के आंकड़े देखकर लगता है कि पैसा हेल्थकेयर में लग रहा है, लेकिन कहीं यह बुलबुला तो नहीं?

यह लेख तथ्यों पर आधारित है और अंग्रेज़ी सीखने के लिए पुनर्रचित किया गया है; पाठक प्रतिक्रियाएँ विविध दृष्टिकोणों के उदाहरण हैं।

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