भारत-चीन संबंध: व्यापार में नंबर-1, विवाद में आमने-सामने
भारत और चीन के बीच संबंध एक ऐसा उलझा गणित हैं जहां trade की गर्मजोशी के बावजूद tension की छाया लगातार बनी रहती है। चीन लगातार 11वें महीने भारत का सबसे बड़ा trading partner बना हुआ है, जिसके साथ व्यापार का आकार अप्रैल से फरवरी के बीच 137 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यह आंकड़ा अमेरिका के मुकाबले भी आगे है, जिसके साथ इस अवधि में भारत का व्यापार 127.8 अरब डॉलर रहा।
चीनी दूतावास के प्रवक्ता जू फेइहोंग ने इस उपलब्धि पर सोशल मीडिया पर statement जारी कर pride जताया। उन्होंने कहा कि चीन वित्त वर्ष 2026 में भी भारत का शीर्ष व्यापारिक साझेदार बना रहा। यहां तक कि महावाणिज्य दूत किन जी ने कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापार external factors से अप्रभावित रहेगा, क्योंकि दोनों बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं जो multilateral trade के समर्थक हैं।
लेकिन व्यापार की इस मजबूती के बावजूद राजनीतिक मोर्चे पर dispute गहराता जा रहा है। हाल ही में चीन ने अरुणाचल प्रदेश में कई स्थानों के लिए चीनी नामों की घोषणा की, जिसे भारत ने साफ तौर पर खारिज कर दिया। विदेश मंत्रालय ने कहा कि ऐसे दावे और निराधार विमर्श भारतीय territory की 'अकाट्य वास्तविकता' को नहीं बदल सकते।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह द्वंद्व दोनों देशों के लिए एक जटिल diplomatic challenge है। एक तरफ आर्थिक आपसी निर्भरता लगातार बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ सीमा disagreement और भू-राजनीतिक दबाव रिश्तों में खटास डाल रहे हैं। भारत के लिए चीन पर आयात निर्भरता कम करने की नीति के बावजूद, व्यापार का आकार बना हुआ है, जो दोनों ओर की आर्थिक जरूरतों को दर्शाता है।
इस उलझे हुए संबंध में एक तरफ economic cooperation की तेज धड़कन है, तो दूसरी ओर geopolitical friction की ठंडी हवा। भारत को अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए व्यापार के दरवाजे खुले रखने का संतुलन बनाना है, जबकि चीन के लिए आर्थिक लाभ और रणनीतिक दबाव के बीच रास्ता तलाशना एक सूक्ष्म खेल बना हुआ है।
व्यापार तो बढ़ रहा है, लेकिन trust भरोसा कम होता जा रहा है। क्या यही हमारा भविष्य है?
अरुणाचल प्रदेश पर चीन के दावे पूरी तरह निराधार हैं। भारत को firm मजबूत रुख अपनाना चाहिए।
137 अरब डॉलर का आंकड़ा बताता है कि चीन से import आयात कितना गहरा है। कम करना मुश्किल, लेकिन जरूरी।
दोनों देश multilateral बहुपक्षीय व्यापार की बात करते हैं, लेकिन व्यवहार में राजनीति हावी है।
सीमा पर disagreement मतभेद तो है, लेकिन व्यापार जारी रखना भी आर्थिक तार्किकता है।
क्या चीन के ये कदम deliberate जानबूझकर तनाव बढ़ाने के लिए हैं, ताकि व्यापार में भारत की नीतियां कमजोर पड़ें?