ईरान-अमेरिका वार्ता असफल, लेकिन महबूबा मुफ्ती कहती हैं: 'समय आने पर रंग लाएगी'
जम्मू-कश्मीर की पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने हालिया talks ने असफल होने की खबरों पर साफ कहा कि यह नाकामी नहीं, बल्कि एक लंबी process की शुरुआत है। पुलवामा में एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, 'वो समय जरूर आएगा जब ये negotiations रंग लाएगी।' उन्होंने जोर देकर कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच मुद्दे इतने जटिल हैं कि उनका resolution रातों-रात नहीं निकल सकता।
मुफ्ती ने ईरान के stance की सराहना करते हुए कहा कि ईरान ने अपने सिद्धांतों पर firmly खड़े रहकर अपनी हिम्मत दिखाई। उन्होंने कहा कि अमेरिका चाहता था कि ईरान अपनी उपलब्धियां, जो 150 बच्चों की शहादत और नेताओं के बलिदान से हासिल हुईं, सौंप दे। 'ये कैसे संभव था?' उन्होंने पूछा। उन्हें खुशी है कि ईरान ने अपना position नहीं छोड़ा और अमेरिका को खाली हाथ लौटना पड़ा।
उन्होंने peace की उम्मीद जताते हुए कहा कि 15 दिन के युद्धविराम में उतार-चढ़ाव स्वाभाविक हैं। जब भी बातचीत शुरू होती है, दोनों पक्ष hardline अपनाते हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका और पूरी दुनिया इस वार्ता की success चाहती है ताकि होर्मुज जलडमरूमध्य फिर से खुल सके। वैश्विक अर्थव्यवस्था ठप है, तेल की prices आसमान छू रही हैं, और व्यापार ठप है।
इस बीच, महबूबा ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के उमर अब्दुल्ला पर criticism तेज कर दी। उन्होंने कहा कि वे जम्मू-कश्मीर के लोगों के मुद्दों पर हमेशा silent रहे हैं। चाहे स्थानीय, राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा हो, उमर अब्दुल्ला को statement देने में एक महीने तक का वक्त लग जाता है। उन्होंने इसे disappointing बताया।
महबूबा ने स्पष्ट किया कि बातचीत खत्म नहीं हुई है। यह सिर्फ एक रुकावट है। उन्होंने कहा कि हमें आशा नहीं छोड़नी चाहिए और patience रखना चाहिए। 'जब सही समय आएगा, तो बातचीत जरूर रंग लाएगी,' उन्होंने कहा। उनके इस message में न केवल राजनयिक उम्मीद की झलक है, बल्कि घरेलू राजनीति में भी एक स्पष्ट positioning झलकती है।
ईरान को खाली हाथ भेजना अमेरिका के लिए भी cost लागत बढ़ा रहा है। तेल की कीमतें देखकर हर आम आदमी की जेब ढीली हो रही है।
महबूबा जी के बयान में logic तर्क है, लेकिन क्या उमर अब्दुल्ला के चुप रहने को इतनी ऊंचाई देना ठीक है? राजनीति तो हर जगह चलती है।
ये सिर्फ talks बातचीत नहीं, बल्कि दो दुनियाओं के बीच का टकराव है। एक तरफ ताकत, दूसरी तरफ सिद्धांत।
मुझे खुशी है कि कोई नेता prayer प्रार्थना और सब्र की बात कर रहा है। आजकल सब तुरंत reaction प्रतिक्रिया चाहते हैं।
क्या वाकई होर्मुज जलडमरूमध्य खुलेगा, या ये सब सिर्फ hope उम्मीद के बहाने वक्त खींचने की रणनीति है?
महबूबा जी ने ईरान की तारीफ की, लेकिन क्या ये support समर्थन भारत के हित में है? यही सवाल बना हुआ है।