निशांत की पाठशाला: जहां राजनीति सीखी जाती है जनता के बीच बैठकर
राजनीति में entry करने के लिए क्या सत्ता के दरवाजे खटखटाने चाहिए या जनता के दिलों की चाबी ढूंढनी चाहिए? निशांत कुमार ने दूसरा रास्ता चुना है। वे डिप्टी सीएम का position ठुकराकर एक संदेश दे चुके हैं: उन्हें राजनीति में थोपा नहीं जा सकता। उनकी मंजिल पद नहीं, बल्कि प्रभाव है। और यह प्रभाव वे नीचे से बनाना चाहते हैं — उसी जमीन से जहां से राजनीति की जड़ें निकलती हैं। निशांत अब ‘जनता की प्राइमरी पाठशाला’ में दाखिल हो रहे हैं, जहां पंचायत स्तर के कार्यकर्ता उन्हें practical सियासत का lesson पढ़ाएंगे।
निशांत ने साफ कर दिया है कि वे सिर्फ नीतीश कुमार के बेटे नहीं, बल्कि एक independent राजनेता बनना चाहते हैं। उनके पास अभी कोई औपचारिक अधिकार नहीं है, सिर्फ एक इच्छा है — जनता से जुड़कर अपनी राजनीतिक पहचान बनाने की। वे गांव-गांव जाकर कार्यकर्ताओं से बातचीत करेंगे, उनके सुझाव लेंगे और organization को मजबूत करने का रास्ता तलाशेंगे। इस यात्रा के पीछे एक बुनियादी विश्वास है: जो नेता जमीन से जुड़ा होता है, जनता उसे accept कर लेती है।
इस यात्रा का मकसद केवल निशांत को राजनीति सिखाना नहीं है, बल्कि जदयू के ग्रामीण कार्यकर्ताओं के बीच फिर से भरोसा कायम करना भी है। नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने और सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी, कई समर्थकों के मन में anger बरकरार है। वे मानते हैं कि नीतीश को सीएम पद से नहीं हटना चाहिए था। निशांत की जिम्मेदारी है कि वे इन नाखुश दिलों को समझें और उन्हें यह एहसास दिलाएं कि अगर नीतीश नहीं हैं, तो भी उनका विरासत जिंदा है।
यह यात्रा नीतीश कुमार की विकास यात्राओं से अलग है। नीतीश जमीनी हकीकत जानने निकलते थे, निशांत जनता के बीच presence की मान्यता लेने निकल रहे हैं। वे अपनी भविष्य की राजनीति की रूपरेखा उसी जनसाधारण से बनाना चाहते हैं, जिनके सवालों और समस्याओं को वे सीधे सुनेंगे। अगर तैराकी सीखनी है, तो तालाब में उतरना जरूरी है — और निशांत अब उसी तालाब में कूद रहे हैं।
एक सप्ताह पहले पटना में जिला और प्रखंड अध्यक्षों के साथ बैठक के बाद यह योजना तैयार हुई। निशांत ने कहा था कि वे कुछ समय लेना चाहते हैं ताकि व्यावहारिक राजनीति को understand सकें। अब वे उसी वादे पर अमल कर रहे हैं। यह शुरुआत छोटी है, माइक्रो लेवल पर है, लेकिन इसका प्रभाव भविष्य में बहुत बड़ा हो सकता है। निशांत नहीं चाहते कि कोई उन्हें imposed हुआ नेता कहे — वे खुद के पैरों पर खड़े होना चाहते हैं।
अगर नेता सच में कार्यकर्ताओं से बात करेंगे, तो पार्टी का connection कनेक्शन जनता से बनेगा।
क्या यह सिर्फ एक सिंबॉलिक यात्रा है या असली बदलाव की शुरुआत?
नीतीश के बाद अब बेटे का दौर? लेकिन पहले तो जनता के बीच जाकर prove साबित करना होगा कि वे जमीन से जुड़े हैं।
अगर निशांत नीचे से शुरुआत कर रहे हैं, तो यह respect सम्मान की बात है। ऊपर से थोपे गए नेताओं पर भरोसा नहीं होता।
देखते हैं कितने दिन चलता है यह अभियान। बहुत से युवा नेता शुरू करते हैं, लेकिन बीच में ही भाग जाते हैं।
इस यात्रा से निशांत को न सिर्फ राजनीति समझने में मदद मिलेगी, बल्कि पार्टी के ग्रासरूट स्तर को भी मजबूती मिलेगी।
हम तो बस इतना चाहते हैं कि कोई भी नेता हमारी बात सच में सुने, सिर्फ फोटो खिंचवाने के लिए नहीं।
अगर वे नीतीश की उपलब्धियों को गांव-गांव पहुंचाने में जुट जाते हैं, तो यह achievement उपलब्धि भी कम नहीं होगी।