डीडी एंकर की अपमानजनक टिप्पणी: राहुल गांधी बनाम सावरकर, और जनता का गुस्सा
दूरदर्शन के सरकारी चैनल डीडी न्यूज़ के वरिष्ठ anchor अशोक श्रीवास्तव ने एक debate के दौरान कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ अपमानजनक language का इस्तेमाल किया, जिससे राजनीतिक tension बढ़ गया है। श्रीवास्तव ने राहुल गांधी को 'सावरकर की चप्पल की धूल' जैसा insulting संबोधन दिया। यह टिप्पणी उनके 10 मार्च के show 'दो टूक' में की गई थी, जहाँ उन्होंने राहुल गांधी के एआई समिट पर दिए गए बयान को लेकर विवाद शुरू किया।
इस controversial टिप्पणी के बाद युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने नई दिल्ली में दूरदर्शन कार्यालय के बाहर protest किया। कार्यकर्ताओं का कहना था कि जनता के taxpayer पैसे से चलने वाला मीडिया चैनल इस तरह की personal attack वाली भाषा को बढ़ावा नहीं दे सकता। प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने कुछ कार्यकर्ताओं को detained में भी ले लिया।
एंकर श्रीवास्तव ने अपनी टिप्पणी का बचाव करते हुए कहा कि जब विपक्ष के नेता स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के खिलाफ अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करेंगे, तो उन्हें उसी tone में जवाब दिया जाएगा। उन्होंने यह भी दावा किया कि आलोचना का जवाब देना उनकी duty है। हालांकि, उनके द्वारा उद्धृत कथन जो चीनी दार्शनिक सुन त्ज़ु के नाम से दिया गया, वह वास्तव में उनका quote नहीं है, बल्कि 2020 के बाद से इंटरनेट पर गलत तरीके से जोड़ा गया एक झूठा उद्धरण है।
इस incident ने मीडिया की neutrality , सार्वजनिक चैनलों के ethics के मानकों और public trust पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कई लोगों का मानना है कि राष्ट्रीय महत्व के चैनलों को राजनीतिक bias से मुक्त होना चाहिए। जबकि कुछ तरफ से यह तर्क दिया जा रहा है कि एंकर ने विपक्ष की narrative को चुनौती देने के लिए कड़ी प्रतिक्रिया दी।
एक सरकारी चैनल का anchor एंकर होने के नाते, इतनी insulting अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना unacceptable अस्वीकार्य है। क्या यही वह standard मानक है जिसे जनता का पैसा समर्थन करता है?
अगर taxpayer करदाताओं का पैसा इस तरह के personal attack व्यक्तिगत हमलों में खर्च होगा, तो लोग निजी media मीडिया को ही क्यों न भरोसा दें?
देखो, राहुल गांधी के खिलाफ भाषा गलत थी, लेकिन क्या सैय्यद जव्वाद का mocking मजाक उड़ाना सही था? दोनों तरफ से tone लहजा बहुत नीचे गिर गया।
पहले डीडी पर बहसें respectful सम्मानजनक हुआ करती थीं। अब लगता है, public trust जन भरोसा भी quickly तेजी से टूट रहा है।
क्या एंकर को यह समझ नहीं कि उनकी टिप्पणी न सिर्फ एक नेता के खिलाफ, बल्कि democratic लोकतांत्रिक चर्चा के spirit भावना के खिलाफ थी?
इस घटना से साफ है कि government channel सरकारी चैनल भी अब political bias राजनीतिक पक्षपात का शिकार हो गए हैं। neutrality तटस्थता कहाँ चली गई?