भारत छठे नंबर पर: गिरावट या बस एक मुद्रा का खेल?
कल्पना कीजिए, आप दौड़ में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन अचानक आपके जूते का lace खुल जाए — आपकी गति वही रहे, फिर भी आप पीछे छूट जाएं। यही हाल भारत की अर्थव्यवस्था का है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की report के अनुसार, भारत वैश्विक जीडीपी रैंकिंग में economy के तौर पर छठे स्थान पर पहुंच गया है। एक वर्ष पहले तक यह चौथे स्थान पर था। यह गिरावट न तो आर्थिक growth रुकने का संकेत है, न ही घरेलू उत्पादन में गिरावट का। बल्कि, यह एक विनिमय दर के झटके का नतीजा है — जहां रुपये की कमजोरी ने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारत की आर्थिक ताकत को छोटा दिखा दिया।
भारत की जीडीपी को डॉलर में मापा जाता है, और जब रुपया devalue है, तो वही आर्थिक उत्पादन डॉलर में कम दिखाई देता है। पिछले एक साल में रुपया डॉलर के मुकाबले लगभग 11 प्रतिशत weaken हुआ, 85 से बढ़कर 94 रुपये प्रति डॉलर पर पहुंच गया। इस impact ने भारत को जापान और ब्रिटेन के पीछे धकेल दिया। लेकिन यहां एक विरोधाभास है: जबकि आईएमएफ ने भारत की रैंकिंग गिराई है, विश्व बैंक ने वृद्धि दर का अनुमान 6.3% से बढ़ाकर 6.6% कर दिया है। मतलब, जमीन पर अर्थव्यवस्था अभी भी perform कर रही है।
इस बीच, विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं। रुपये की अस्थिरता सिर्फ रैंकिंग नहीं, आम जनता की क्रय शक्ति पर भी असर डाल रही है। आयातित माल महंगा हो रहा है, तेल की कीमतें 130 डॉलर प्रति बैरल के करीब बनी हुई हैं, और छोटे उद्योग shut down हो रहे हैं। यह सब बेरोजगारी और असमानता को बढ़ावा दे रहा है। सरकार अमेरिका के साथ आगामी व्यापार-वार्ता पर निर्भर है, लेकिन विश्लेषक कहते हैं, बिना policy में बुनियादी बदलाव के, वार्ताएं भी ठोस परिणाम नहीं दे पाएंगी।
आगे का रास्ता साफ नहीं है। भारत को अब एक साथ दो मोर्चों पर लड़ना होगा — जीडीपी विकास दर को सात से आठ प्रतिशत के स्तर पर ले जाना और रुपये की value स्थिरता सुनिश्चित करना। वर्ष 2047 तक 'विकसित भारत' के लक्ष्य के लिए यह निर्णायक होगा। वर्तमान संकेत बताते हैं कि व्यापारिक तनाव 2026-27 तक जारी रह सकता है। अब सवाल यह नहीं कि हम कितने तेज दौड़ रहे हैं, बल्कि यह है कि हमारा footwear कितना मजबूत है।
इस संदर्भ में, कई टिप्पणीकारों का ध्यान नीतिगत कमजोरियों पर है। आशु पुरोहित राइखेड़ी का कहना है कि यह विरोधाभास है — एक तरफ विकास दर के उच्च अनुमान, दूसरी तरफ रैंकिंग में गिरावट। वे दावा करते हैं कि यह आर्थिक कमजोरी का संकेत नहीं, बल्कि माप की तकनीक का परिणाम है। फिर भी, छवि का नुकसान हुआ है। जनता को सिर्फ आंकड़े नहीं, स्थिरता की assurance चाहिए।
आईएमएफ के data आंकड़े तो विनिमय दर पर आधारित हैं, लेकिन क्या यह वाकई आर्थिक स्वास्थ्य का सही प्रतिबिंब है?
हम अमेरिका के साथ वार्ता कब तक करेंगे? क्या export निर्यात की रणनीति में बदलाव नहीं जरूरी?
रुपये की कमजोरी से आम आदमी का बजट बिगड़ रहा है।
सरकार को बस वृद्धि दर के आंकड़ों पर नहीं, employment रोजगार की गुणवत्ता पर भी ध्यान देना चाहिए।
अगर डॉलर मजबूत हो रहा है, तो क्या भारत अकेला है जिसकी रैंकिंग गिरी?
2047 तक विकसित भारत? पहले 2027 तक रुपये को स्थिर कर दीजिए।
विश्व बैंक के अनुमान दिल को hope उम्मीद से भर देते हैं। हम अभी भी पटरी पर हैं।
रैंकिंग तो सिर्फ आंकड़ा है, लेकिन जब तक policy नीतियां जमीन पर नहीं उतरतीं, आम आदमी नहीं बचेगा।