40 दिन लड़कर भी अमेरिका क्यों नहीं हरा सका ईरान? डिफेंस एक्सपर्ट ने बताया असली कारण
अमेरिका जैसी दुनिया की सबसे ताकतवर सेना को भी ईरान के खिलाफ military pressure बनाने में 40 दिनों में सफलता नहीं मिली। इजरायल के तकनीकी समर्थन के बावजूद, अमेरिका की उम्मीदों के विपरीत युद्ध जल्दी समाप्त नहीं हुआ। अब 14 दिनों के लिए मिसाइलों की आवाज थम गई है, और पाकिस्तान में ईरान-अमेरिका के बीच बातचीत चल रही है। इस बीच, भारत के प्रमुख रक्षा विशेषज्ञ एयर मार्शल संजीव कपूर (सेवानिवृत्त) ने ईरान के रक्षा ढांचे के पीछे छिपे strategic secret को उजागर कर दिया है।
जब उनसे पूछा गया कि अमेरिका ने बंकर बस्टर बम गिराए, फिर भी उसे पूर्ण सफलता क्यों नहीं मिली? तो उन्होंने स्पष्ट किया कि इन बमों की भेदन क्षमता अधिकतम 60 मीटर तक होती है, जबकि ईरान ने अपने महत्वपूर्ण सैन्य ढांचे धरती की सतह से 500 मीटर से भी नीचे बना रखे हैं। उनका कहना था कि दुनिया में अभी तक ऐसा कोई military technology नहीं है जो इतनी गहराई में नुकसान पहुंचा सके।
कपूर ने आगे बताया कि ईरान का इलाका घने जंगलों और पहाड़ियों से घिरा है, जहां छोटे missile units एक झुंड की तरह तेजी से आगे-पीछे होती हैं। वे एक छिपे स्थान से यूएई, कतर या सऊदी अरब पर मिसाइल दागते हैं और तुरंत दूसरी जगह चले जाते हैं। इस hit-and-run tactic के कारण उन्हें निशाना बनाना लगभग असंभव हो जाता है।
विशेषज्ञ ने पाकिस्तान के संभावित रणनीतिक बदलाव की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने चेतावनी दी कि आने वाले समय में युद्ध की प्रकृति बदल सकती है। वे कहते हैं कि अगली लड़ाई में पाकिस्तान नागरिक इलाकों से मिसाइल दाग सकता है—लाहौर की गलियों से भी। ऐसे में, किसी जवाबी कार्रवाई पर नागरिक जानों के नुकसान का international criticism का खतरा बना रहेगा।
इस स्थिति ने यह साफ कर दिया है कि आधुनिक युद्ध अब न केवल ताकत, बल्कि रणनीतिक गहराई और भूमिगत बुनियादी ढांचे पर निर्भर करते हैं। डिफेंस एक्सपर्ट के अनुसार, भारत को भी अब रक्षा नीति में पहले हमला करने की strategic shift पर विचार करना चाहिए, क्योंकि भविष्य के संघर्षों में प्रतिक्रिया देने से ज्यादा महत्व आक्रामक तैयारी को होगा।
ये बात सच है कि आज के युद्धों में physical strength शारीरिक ताकत कम और रणनीति ज्यादा अहम होती है। ईरान की गहराई में सुरंगें एक बड़ा फायदा हैं।
अमेरिका के बंकर बस्टर बम भी 60 मीटर से आगे नहीं जा सकते? ये तो बहुत बड़ी कमजोरी है। क्या हमारे पास ऐसी तकनीक है जो इस underground threat भूमिगत खतरे का सामना कर सके?
लाहौर की गलियों से मिसाइल दागने की बात बहुत खतरनाक है। इससे जवाबी कार्रवाई करना नैतिक और political cost राजनीतिक लागत की दृष्टि से मुश्किल हो जाएगा।
क्या ये सिर्फ ईरान और अमेरिका की कहानी है? नहीं। ये एक चेतावनी है कि भविष्य के युद्ध civilian zones नागरिक क्षेत्रों में लड़े जाएंगे। हमें इसके लिए मानसिक रूप से तैयार होना होगा।
अब समझ आता है कि क्यों दुनिया भर के देश अपनी सेना को भूमिगत बना रहे हैं। ये नई war reality युद्ध की वास्तविकता है। ऊपर से हमला अब पुराना हो गया।
कपूर साहब ने सही कहा—हमें अब 'पहली चपेट में आने' की बजाय 'पहला हमला करने' की रणनीति अपनानी होगी। वरना दबाव हमेशा हमारे national security राष्ट्रीय सुरक्षा पर रहेगा।