युद्ध की छाया में भारत: महंगाई और निष्क्रियता का संकट
पश्चिम एशिया में war की लपटों ने भारत को भी घेर लिया है, लेकिन सरकार अभी भी इनकार के भाव में जी रही है। 28 फरवरी, 2026 को शुरू हुए इस conflict ने न सिर्फ ईरान, इजराइल और अमेरिका को निगल लिया है, बल्कि भारत के आर्थिक स्थिरता के दावों को भी झटका दिया है। लाखों भारतीय वहां के देशों में रहते और काम करते हैं, और ईरान के साथ पारंपरिक ties भी गहरे हैं। चाबहार बंदरगाह जैसी परियोजनाएं भारत की रणनीतिक उपस्थिति के प्रतीक थीं, लेकिन अब वे धूल खा रही हैं।
भारत की विदेश नीति अब पहले जैसी independent नहीं लगती। प्रधानमंत्री मोदी और इजराइल के नेतन्याहू के बीच निकटता ने भारत को ईरान से distance बनाने पर मजबूर किया है। जब युद्ध शुरू हुआ, तो अमेरिका और इजराइल ने भारत को बाहर रखा, जबकि ईरान ने भारत को जानकारी दी। भारत ने ब्रिक्स में इजराइल की आलोचना वाले प्रस्ताव पर वीटो लगाकर अपना stance साफ कर दिया। फिर भी, शांति वार्ता में पाकिस्तान को प्राथमिकता मिली — एक झटका, जो भारत की वैश्विक प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा करता है।
आर्थिक मोर्चे पर, inflation सबसे बड़ी चिंता बन गई है। आरबीआइ ने चेतावनी दी है कि supply chain पर दबाव, ईंधन और खाद्य पदार्थों की कीमतों में उछाल, और विदेशी निवेश में अस्थिरता भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए खतरा है। सरकार ने पेट्रोल-डीजल की कीमतें तो स्थिर रखीं — शायद election के कारण — लेकिन अन्य मोर्चों पर उसकी response नाममात्र रही। आयात में मंदी और बांड बाजार में उथल-पुथल ने स्थिति और भी गंभीर बना दी है।
जनजीवन भी बदल रहा है। household बजट तंग हो रहे हैं, और एलपीजी की बढ़ती कीमतों के कारण कई जगह firewood का इस्तेमाल वापस लौट आया है। खपत कम हुई है, बचत बढ़ी है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में चिंता साफ झलकती है। सरकार के पास समाधान के तरीके हैं — मनरेगा बकाया भुगतान, पीएमजीएसवाई में तेजी, जल जीवन मिशन के लिए धन जारी करना, और एमएसएमई क्षेत्र को बचाने के लिए loan का प्रवाह। लेकिन अभी तक निष्क्रियता ही हावी है।
अगर भारत वैश्विक crisis में अपनी आर्थिक नीतियों को नहीं संभालता, तो युद्ध की लागत सीधे जनता के कंधों पर आ जाएगी। सरकार के पास अभी भी समय है कि वह सार्वजनिक सुविधाओं पर खर्च करके रोजगार बढ़ाए और आय को सुरक्षित करे। यही वह strategy है जो विदेशी घटनाओं के प्रभाव को कम कर सकती है। अन्यथा, भारत न केवल क्षेत्र में अलग-थलग पड़ेगा, बल्कि आंतरिक तनाव से भी जूझेगा।
क्या हम वाकई इतने neutral तटस्थ हैं या सिर्फ चुनावी दबाव में झुक गए हैं?
आरबीआइ की चेतावनी सुनने वाला कोई है? inflation महंगाई तो पहले से ही रसोई तक पहुंच चुकी है।
मेरे गांव में लोग लकड़ी जला रहे हैं। सरकार का 'सब कुछ सामान्य' झूठ सिर्फ शहरों तक सीमित है।
चाबहार बंदरगाह जैसी परियोजनाएं अधूरी क्यों हैं? यही तो हमारी strategic रणनीतिक नीति की कमजोरी दिखाता है।
सरकार को प्रार्थना करने के बजाय कदम उठाने चाहिए। आम आदमी की जीविका खतरे में है।
ट्रंप के झूठे दावे, नेतन्याहू की दोस्ती, और भारत की चुप्पी — ये सब मिलकर एक विदेश नीति का संकट बन रहे हैं।
अभी भी समय है। मनरेगा और जल जीवन मिशन पर धन खर्च करने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है।
शांति के बाद भी आपूर्ति शृंखला बहाल होने में साल लगेंगे। तब तक तो economy अर्थव्यवस्था और डगमगा चुकी होगी।