बिजली बंद, गैस खत्म: पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर एक साथ कितने संकट?
पाकिस्तान की बिजली रोशनी धीरे-धीरे बुझती जा रही है — न केवल घरों में, बल्कि अर्थव्यवस्था के हर कोने में। economy पहले से डगमगा रही थी, लेकिन अब fuel की कमी और महंगाई ने तिगुना दबाव डाल दिया है। अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते tension का असर दुनिया भर में ऊर्जा की आपूर्ति पर पड़ा, और पाकिस्तान, जो लगभग पूरी तरह imported ईंधन पर निर्भर है, सीधे तौर पर इसकी चपेट में आ गया। होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक रास्तों में अस्थिरता ने supply को कम कर दिया, और कीमतें आसमान छू गईं।
इसका असर सीधे बिजली बिलों पर दिखने लगा है। पाकिस्तानी बिजली नियामक adjustment के तहत फरवरी में प्रति यूनिट 1.42 पाकिस्तानी रुपये की बढ़ोतरी की तैयारी कर रहे हैं। इसके साथ ही देश के कई हिस्सों में बिजली कटौती और gas की कमी की शिकायतें आ रही हैं। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि अगर यह संकट गर्मियों तक खिंचा, जब demand सबसे ज्यादा होती है, तो स्थिति और भी खराब हो सकती है। अब तो लोगों के bills और रोजमर्रा की जिंदगी दोनों पर भारी बोझ पड़ रहा है।
सरकार की ओर से ऊर्जा बचाने के लिए कदम उठाए गए हैं, लेकिन वे विवादों में घिर गए हैं। दुकानों को जल्दी बंद करने के आदेश ने retail व्यापारियों को झकझोर दिया है। association का दावा है कि दो हफ्तों में लगभग 200 अरब रुपये का नुकसान हुआ है। छोटे और अनौपचारिक बाजारों पर इसका कम असर पड़ा, जबकि संगठित stores को भारी नुकसान हुआ। इससे न केवल आर्थिक loss हुआ, बल्कि नीति की निष्पक्षता पर भी सवाल उठे हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह संकट लंबे समय तक चल सकता है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के अनुसार, तीन करोड़ से ज्यादा लोग फिर से गरीबी में धकेले जा सकते हैं, खासकर जब farming के महत्वपूर्ण समय में ईंधन और fertilizer की कमी हो रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर तनाव खत्म भी हो जाए, तब भी impact लंबे समय तक बने रहेंगे। पाकिस्तान के सामने अब कोई आसान रास्ता नहीं है — न तो ऊर्जा के मोर्चे पर, न ही विश्वास के स्तर पर।
इतनी बिजली कटौती में तो घर में रहना भी मुश्किल हो गया होगा। daily life रोजमर्रा की जिंदगी पूरी तरह बिगड़ गई होगी।
सरकार को चाहिए कि वह ऊर्जा बचाने के लिए नई तकनीक पर ध्यान दे, बजाय लोगों को परेशान करने के।
क्या वाकई छोटे दुकानदारों पर कम असर पड़ा? ये तो लगता है unfair अन्याय की बात है।
अगर खेती में ईंधन नहीं मिलेगा, तो खाने की कीमतें भी बढ़ेंगी। farming खेती पर संकट का असर सबके जीवन पर पड़ेगा।
हम तो पहले से बिजली और गैस के लिए लड़ रहे थे, अब बाहरी तनाव ने तो सब कुछ उलट दिया।
ये नीतियां तो सिर्फ दिखावे के लिए हैं। असली solution समाधान कहीं नजर नहीं आ रहा।