नोएडा हिंसा के आठ दिन बाद: आग बुझी, लेकिन डर क्यों नहीं?
नोएडा के सेक्टर 62 के बी-ब्लॉक मार्केट में आज दुकानें खुली हैं, मशीनें चल रही हैं और ऑटो रिक्शा सड़कों पर भर गए हैं। लेकिन उस दिन की यादें अभी भी atmosphere में घुली हैं। आठ दिन पहले जो हुआ, वह किसी film दृश्य जैसा था — लेकिन यहां खतरा real था, न कि रील। उपद्रवी हाथ में sticks , stones और पेट्रोल में भीगे कपड़े लिए घूम रहे थे। एक दुकानदार ने कहा, "हमें लगा था कि हमारी मार्केट भी आग के हवाले होने वाली है।" लेकिन police की समय पर एंट्री ने बड़े नुकसान को टाल दिया।
दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे और इलेक्ट्रॉनिक सिटी के आसपास का माहौल और भी tense था। भीड़ ने जाम लगाया, वाहनों में तोड़फोड़ की और कुछ सेवा केंद्रों पर fire की कोशिश की। ऑटो चालकों ने बताया कि सड़क पर निकलना खतरे के समान था। एक ऑटो ड्राइवर ने कहा, "भीड़ सिर्फ गुस्से में नहीं थी, उसे provoked भी जा रहा था।" आसपास के लोगों पर दबाव डाला जा रहा था कि वे हिंसा में involved हों। यह सिर्फ गुस्से का आवेग नहीं, बल्कि एक planned उथल-पुथल लग रही थी।
जेपी यूनिवर्सिटी के परिसर में डर का vibe था। करीब दो हजार छात्रों की सुरक्षा चिंता का विषय थी। सीनियर एडमिन मैनेजर अजीत तोमर ने बताया कि पुलिस ने alert जारी कर दिया था, जिसके बाद कैंपस में security बढ़ा दी गई। एक क्षण ऐसा भी आया जब लगा कि भीड़ परिसर की ओर बढ़ेगी, लेकिन भारी पुलिस बल ने उन्हें रोक दिया। इसी तरह, सेक्टर 57-59 के industrial क्षेत्र में कारोबारी राजेश कटियार ने बताया कि फैक्ट्री की बजाय पहले workers की सुरक्षा महत्वपूर्ण थी।
आज एनसीआर की अर्थव्यवस्था economy पटरी पर लौट रही है। बाजार खुल गए हैं, फैक्ट्रियां चल पड़ी हैं और जीवन सामान्य हो रहा है। पुलिस ने मुख्य आरोपियों — आदित्य आनंद, रूपेश राय और मनीषा चौहान समेत कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। लेकिन एक बड़ी चुनौती बाकी है: workforce की कमी। कई कंपनियों का कहना है कि हिंसा के बाद घर गए वर्कर्स अभी तक वापस नहीं आए हैं। गारमेंट्स सेक्टर में shortage 30 से 35 प्रतिशत तक पहुंच गई है। आर्थिक स्थिरता लौट रही है, लेकिन recovery सुरक्षा का सवाल अभी खुला है।
पुलिस की त्वरित कार्रवाई ने सचमुच बड़ा आपदा टाल दिया। वरना आज हम बाजार की जगह कब्रिस्तान देख रहे होते।
काम पर लौटे वर्कर्स के लिए कंपनियों को incentives प्रोत्साहन देना चाहिए। डर कम होगा तभी वे वापस आएंगे।
जेपी यूनिवर्सिटी के छात्रों की सुरक्षा को लेकर प्रशासन ने बहुत सही कदम उठाए।
सड़क पर निकलना अभी भी थोड़ा risky जोखिम भरा लगता है। क्या स्थानीय लोगों को सुरक्षा में शामिल किया जा सकता है?
एक बार फिर साबित हुआ कि भारत की शहरी अर्थव्यवस्था कितनी नाजुक है।
मैं उस दिन सेक्टर 58 में था। भीड़ को motivated प्रेरित करने वाले लोग साफ दिख रहे थे।
अर्थव्यवस्था तो चल सकती है, लेकिन टूटा भरोसा कैसे बहाल होगा?