…तो भारत आज स्वर्ग होता', असदुद्दीन ओवैसी का नाम लेकर गिरिराज सिंह ने यह क्यों कहा?
केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के statement पर तीखी criticism करते हुए कहा कि अगर 1947 में भारत से सभी मुसलमान पाकिस्तान चले गए होते और सभी हिंदुओं को वहां से ले आया गया होता, तो today भारत heaven होता। उन्होंने यह comment पटना में एक media interaction के दौरान की, जहां उन्होंने ओवैसी के हालिया claim का जवाब दिया, जिसमें उन्होंने देश के बंटवारे के लिए कांग्रेस को responsible ठहराया था।
गिरिराज सिंह ने कहा कि पूरी दुनिया में सबसे अधिक comfort के साथ भारत में मुसलमान रह रहे हैं, फिर भी कुछ लोग देश के खिलाफ abuse दे रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि नेहरू और जिन्ना की ambition और गांधी जी की mediation के कारण बंटवारा हुआ। उनके अनुसार, अधिकांश मुसलमान बंटवारे के favor में थे, और जो भारत में रह गए, वे आज भी ideology के आधार पर देश के खिलाफ बोलते हैं।
इसके जवाब में, ओवैसी ने कहा था कि बार-बार मुसलमानों को बंटवारे के लिए blamed ठहराया जाता है, जबकि उस समय 90 फीसदी मुसलमानों को vote का अधिकार नहीं था। उन्होंने जिन्ना को tyrant बताया और पूछा कि क्या कांग्रेस उस division में शामिल नहीं थी। यह debate ऐतिहासिक घटनाओं को लेकर न सिर्फ राजनीतिक बलों के बीच तनाव को दर्शाती है, बल्कि आज के public discourse में उसके impact को भी।
इस विवाद से साफ है कि बंटवारे की legacy आज भी भारतीय राजनीति में जीवित है। गिरिराज सिंह के rhetoric ने एक बार फिर धार्मिक समूहों के बीच tension को बढ़ाने का accusation लगाया है, जबकि ओवैसी के बयान ने पिछले इतिहास के narrative पर सवाल उठाया है। ऐसे statements न केवल सामाजिक harmony पर असर डालते हैं, बल्कि चुनावी politics में भी गहरा influence डालते हैं।
एक तरफ unity एकता की बात करते हैं, तो दूसरी तरफ ऐसे divisive विभाजक बयान देते हैं। क्या यही nationalism राष्ट्रवाद है?
अगर भारत स्वर्ग होता, तो क्या आज poverty गरीबी, unemployment बेरोजगारी और inequality असमानता नहीं होती?
ओवैसी के सवाल में logic तर्क है। जिन्हें franchise मताधिकार नहीं था, उन पर बंटवारे का blame दोष कैसे?
गिरिराज सिंह हमेशा controversy विवाद खड़ा करने के लिए बोलते हैं। राजनीति के लिए धर्म का इस्तेमाल।
स्वर्ग तो दूर की बात है, आज लोगों को basic rights मूल अधिकार भी नहीं मिल रहे।
ऐतिहासिक truth सच्चाई को distort विकृत करना खतरनाक है। क्या इतिहास को instrument साधन बनाया जा रहा है?
इन सबके बीच आम आदमी कहां है? बहस तो ऊपर है, पर impact असर नीचे जनता पर पड़ता है।
क्या ऐसे extreme चरम बयानों से सच में peace शांति आएगी? या बस tension तनाव बढ़ेगा?