सिसोदिया की दलीलों के बीच केजरीवाल का कोर्ट छोड़कर जाना: जज ने क्यों पूछा 'कहां गए अरविंद?'
दिल्ली आबकारी नीति मामले की सुनवाई के दौरान एक अजीब सा मोड़ आया, जब मनीष सिसोदिया की दलीलों ने शुरू होते ही अरविंद केजरीवाल कोर्टरूम में चुप हो गए। उन्होंने बहस के बीच ही कमरा छोड़ दिया, जिसके बाद जज ने एक तीखी लेकिन हल्के स्वर में टिप्पणी की—‘कहां गए अरविंद?’ यह घटना न सिर्फ सुनवाई के माहौल को बदल गई, बल्कि न्यायिक निष्पक्षता और राजनीतिक प्रतिक्रिया के बीच के तनाव को भी उजागर कर गई।
केजरीवाल ने सुनवाई के शुरुआती पड़ाव में खुद खड़े होकर अपनी arguments पेश कीं। उन्होंने जज के कुछ ideological events में भाग लेने पर आपत्ति जताई और कहा कि इससे निष्पक्ष hearing को लेकर उनमें आशंका पैदा होती है। उनका मुख्य तर्क यह था कि यह न्यायाधीश की ईमानदारी नहीं, बल्कि perception का मसला है—कि पीड़ित पक्ष को लगे कि न्याय निष्पक्ष मिल रहा है। उन्होंने सीबीआई को ‘पिंजरे का तोता’ बताते हुए उसकी independence पर भी सवाल उठाए।
जैसे ही सिसोदिया के वकीलों ने अपनी बहस शुरू की, केजरीवाल चुपचाप बैठ गए और कुछ ही देर में कोर्टरूम छोड़कर चले गए। इस बात पर बेंच ने टिप्पणी की कि उन्होंने जी भरकर presented की अपनी बात, लेकिन अब वे कहां गए? यह न केवल एक न्यायिक प्रश्न था, बल्कि राजनीतिक accountability का भी सवाल था। क्या एक नेता अपनी बात रखकर चला जा सकता है, जब दूसरे पक्ष की बारी हो?
कोर्ट ने साफ किया कि वह delay के पक्ष में नहीं है और मामले की सुनवाई आज ही पूरी की जाएगी। इस बीच सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता समेत सरकारी वकीलों ने भी अपनी बात रखी। मामले में न सिर्फ धारणा का दबाव था, बल्कि legal प्रक्रिया के प्रति राजनीतिक नेताओं के व्यवहार का भी सवाल उठा। क्या एक नेता कोर्ट में अपनी बात रखकर चला जाए, या वहां रुककर दूसरे पक्ष की दलीलों का सम्मान करे?
अगर आपने कोर्ट में hearing सुनवाई शुरू की है, तो दूसरे पक्ष की बात सुनना भी तो आचरण का हिस्सा है।
केजरीवाल को लगा होगा कि उनकी arguments दलीलें पूरी हो गईं, लेकिन जज का सवाल ‘कहां गए अरविंद?’ बहुत कुछ कह गया।
राजनीतिक नेता अक्सर public trust जन भरोसे की बात करते हैं, लेकिन खुद न्याय प्रणाली के सामने गंभीर न लगें, तो विरोधाभास लगता है।
जज के विचारधारात्मक events कार्यक्रमों में शामिल होना वाकई चिंता की बात है। धारणा भी न्याय का हिस्सा होती है।
क्या ये सब एक drama नाटक था? केजरीवाल जानबूझकर चले गए ताकि ध्यान भटके?
न्यायालय में independence स्वतंत्रता और accountability जवाबदेही दोनों का मतलब होता है। नेता भी इसके अलावा नहीं।