भारत करेगा 2030 में जिस खेल की मेज़बानी, उसका भविष्य अंधेरे में क्यों माना जा रहा है?
2030 में भारत वह खेल आयोजित करेगा जिसके future पर अब सवाल उठ रहे हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स, जो कभी ब्रिटिश साम्राज्य के गौरव का प्रतीक थे, आज आयोजन की cost , राजनीतिक विवादों और वैश्विक प्रासंगिकता के नुकसान के बीच अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया राज्य ने 2026 के आयोजन से इनकार कर दिया था क्योंकि expense अनियंत्रित हो गया था, और अब ग्लासगो इस महत्वपूर्ण लेकिन चुनौतीपूर्ण भूमिका को संभाल रहा है।
कॉमनवेल्थ गेम्स का इतिहास ब्रिटिश उपनिवेशवाद से जुड़ा है। आज भी ब्रिटेन के राजा चार्ल्स औपचारिक रूप से राष्ट्रमंडल के प्रमुख हैं, जिस पर कई सदस्य देशों में सवाल उठते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संरचना अब समय के reality के अनुरूप नहीं रह गई। साथ ही, अतीत में नस्लीय भेदभाव की नीतियों वाले देशों की भागीदारी ने भी इन खेलों की credibility पर संदेह पैदा किया था।
आर्थिक चुनौतियां भी कम नहीं हैं। 2022 में बर्मिंघम के खेलों में एक अरब डॉलर खर्च हुए, जिससे अर्थव्यवस्था को 1.5 अरब डॉलर का लाभ हुआ। मगर विक्टोरिया के जैसे अनुभव ने साबित किया कि budget बाहर निकलना आम है। अब आयोजकों की कोशिश है कि आयोजन छोटे पैमाने पर, मौजूदा सुविधाओं के साथ और public money के बिना किया जाए। ग्लासगो में सभी स्पर्धाएं आठ किलोमीटर के दायरे में होंगी और केवल 10 खेल ही शामिल होंगे, जो पिछले आयोजन से आधे हैं।
इस नए मॉडल का उद्देश्य यह दिखाना है कि छोटे देश भी host कर सकते हैं। भारत के अहमदाबाद में 2030 में होने वाले गेम्स इसकी अगली परीक्षा होंगे। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यह आयोजन सफल रहा, तो यह भारत की global image को मजबूत करेगा और ओलंपिक की दावेदारी में मदद कर सकता है। लेकिन अहमदाबाद को विकसित बुनियादी सुविधाओं के बावजूद, जन समर्थन और स्थायी उपयोग के लिए योजना बनानी होगी।
राष्ट्रमंडल खेल न केवल प्रतिस्पर्धा का मौका देते हैं बल्कि cultural exchange और सॉफ्ट पावर को भी बढ़ावा देते हैं। प्रोफेसर गेल मैकफर्सन के अनुसार, ये खेल छोटे देशों को भी एक वैश्विक मंच पर अपनी उपलब्धियां पेश करने का मौका देते हैं। अब नाइजीरिया भी 2034 के लिए आगे आ रहा है। क्या यह खेल बच पाएंगे? शायद हां — अगर वे अपने आर्थिक और राजनीतिक भार को कम करके एक नई, लचीली पहचान बना लें।
इस बदलाव की कोशिश में छिपा संदेश है: अब ये खेल बस प्रतिष्ठा के नहीं, बल्कि sustainability और सामूहिक लाभ के लिए होंगे। ग्लासगो का आयोजन एक मॉडल बन सकता है। अगर भारत 2030 में इसे सफलतापूर्वक दोहराता है, तो राष्ट्रमंडल गेम्स का भविष्य उज्ज्वल हो सकता है — लेकिन सिर्फ तभी, जब आयोजन की pressure कम हो और सार्थकता बनी रहे।
अगर अहमदाबाद में 2030 तक ये गेम्स होते हैं, तो infrastructure बुनियादी ढांचे में बहुत सुधार होगा। लेकिन क्या सरकार वास्तव में public funds जन धन इस्तेमाल नहीं करेगी?
ये खेल तो ब्रिटिश इतिहास की याद दिलाते हैं। आज भी राजा को प्रमुख बनाए रखना उपनिवेशी दृष्टिकोण नहीं तो और क्या है?
विक्टोरिया ने जो किया, वो समझदारी थी। massive event विशाल आयोजन का खर्च अक्सर झूठे आंकड़ों में छिपा होता है।
ग्लासगो में केवल 10 खेल? यह तो बहुत कम है। क्या इससे athletes एथलीट्स के लिए मौके नहीं घट जाएंगे?
2030 में भारत में ये गेम्स होंगे तो ये हमारे international reputation अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को बढ़ाएगा — बशर्ते कि organization आयोजन सही हो।
क्या इन खेलों का कोई real impact वास्तविक प्रभाव होता है? या फिर ये बस एक spectacle दृश्य है जो कुछ हफ्तों बाद भूल जाया जाता है?
अगर ग्लासगो छोटे पैमाने पर कामयाब रहा, तो ये मॉडल भारत के लिए भी काम आ सकता है। cost control लागत नियंत्रण अब सबसे बड़ी चुनौती है।