स्त्री आबादी में आधी है तो उसे गणराज्य आधा क्यों नहीं हो?
लोकसभा में new bill गिर गया। यह constitutional amendment था जो 2029 के चुनावों से पहले women’s reservation को लागू करने का रास्ता साफ करता। 528 सदस्यों ने voting किया; 298 पक्ष में, 230 विपक्ष में — लेकिन two-thirds majority नहीं मिला, जो जरूरी था। एक विधेयक गिरा, हां, लेकिन साथ में गिरा भारत के लोकतंत्र का एक broken mirror , जिसमें स्त्री, सत्ता, न्याय और भय के प्रतिबिंब धुंधले थे।
स्त्रियां देश की half population हैं। आधे मतदाता, आधा समाज। लेकिन क्या वे केवल आधा श्रम करती हैं? आधी देखभाल? आधी पीड़ा सहती हैं? नहीं। वे double labor , extra care , और hidden pain अपने भीतर लिए चलती हैं। फिर भी उन्हें केवल 33 प्रतिशत क्यों? यह केवल एक मांग नहीं, यह logical conclusion है कि उन्हें 50 प्रतिशत हक होना चाहिए।
भारतीय लोकतंत्र ने लंबे समय तक स्त्री को नागरिक तो माना, पर natural right नहीं दिया। संसद में उनकी उपस्थिति आज भी 'विशेष' लगती है — अपवाद, प्रसाद न कि अधिकार। चुनावी हिंसा, पैसे का प्रभाव, टिकट वितरण, पारिवारिक वंशवाद — ये सब मिलकर एक invisible wall बनाते हैं। यह 'प्रतिस्पर्धा' नहीं, विशेषाधिकार का संरक्षण है। equal access के बिना, योग्यता का दावा खोखला है।
महिला आरक्षण को symbolic gesture या उदारता समझना गलत है। यह संख्या नहीं, अनुभव का संस्थानीकरण है। जो बातें सदियों तक निजी मानी गईं — देखभाल, घरेलू हिंसा, स्वास्थ्य, सुरक्षा — उन्हें कानून में जगह मिलनी चाहिए। जो समाज अपनी विधायिकाओं में स्त्री-अनुभव को अनुपस्थित रखता है, वह incomplete justice देता है।
33 प्रतिशत कोई अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि एक historical compromise है। अगर नारी शक्ति की बात करनी है, तो वंदन नहीं, equal partnership चाहिए। स्त्री को पूजा जाता है, पर निर्णय लेने वाली मेज़ पर जगह नहीं। यह विरोधाभास अब बर्दाश्त का बाहर है। सत्ता के ऊपरी सदनों में भी महिलाओं की उपस्थिति दस प्रतिशत से कम है — यह लोकतंत्र के साथ धोखा है।
कुछ लोग कहते हैं कि 50 प्रतिशत की मांग अतिवाद है। लेकिन असली अतिवाद तो यह है कि महिलाएं समाज का भार उठाएं और सत्ता में तिहाई हिस्सा पाकर भी show gratitude दिखाएं। proxy women का डर है, लेकिन आरक्षण को नकारने के बजाय, प्रशिक्षण, वित्तीय समर्थन और institutional protection की जरूरत है। अगर लोकतंत्र सच में न्याय चाहता है, तो उसे अपनी आधी आत्मा को दरवाजे पर नहीं रोकना चाहिए।
33 प्रतिशत के बजाय 50 प्रतिशत क्यों? क्योंकि half population आधी आबादी को बराबर का हक है। यह न्याय है, कोई भिक्षा नहीं।
हर बार यही बहाना — 'अभी नहीं', 'समय नहीं', 'अन्य मुद्दे हैं'। कब आएगा वह right time सही समय जब पुरुष प्रधानता को चुनौती दी जा सके?
मैं समर्थन करता हूं, लेकिन क्या proxy candidates प्रॉक्सी उम्मीदवार की संभावना नहीं है? टिकट पति या पिता लेंगे, महिला सिर्फ नाम के लिए होगी।
उसका जवाब नहीं है। real solution असली समाधान यह नहीं कि आरक्षण रोका जाए, बल्कि पारदर्शिता और समर्थन बढ़ाया जाए।
मैंने गांव में देखा है — जहां local councils स्थानीय परिषदों में महिलाओं को आरक्षण मिला, वहां बदलाव आया। स्कूल, स्वच्छता, पानी — सबमें सुधार हुआ।
एक सवाल: क्या caste census जातिगत जनगणना के बिना यह न्यायपूर्ण होगा? स्त्री के भीतर भी तो विषमता है — दलित, आदिवासी, पिछड़ी।