Delimitation 2026: परिसीमन के कारण क्यों बढ़ा उत्तर Vs दक्षिण, दक्षिण की सीटें घटने की वजह क्या?
2026 के delimitation को लेकर भारतीय राजनीति में एक गहरा tension उभर रहा है। उत्तर और दक्षिण के बीच लोकसभा सीटों के distribution को लेकर बहस तेज हो गई है, जहां दक्षिण के राज्यों को डर है कि उनकी राजनीतिक representation कम हो जाएगी। संसद के विशेष सत्र में चल रही चर्चा में यह स्पष्ट है कि परिसीमन सिर्फ आँकड़ों का मसला नहीं, बल्कि संघीय संतुलन पर खतरा है।
फिलहाल लोकसभा में 543 सीटें हैं, लेकिन परिसीमन के बाद यह संख्या 850 तक पहुंच सकती है। भारत के constitution के अनुच्छेद 81(2) के मुताबिक, सीटों का आवंटन जनसंख्या के आधार पर होना चाहिए। इसका मतलब है कि उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों को अधिक सीटें मिल सकती हैं, जबकि दक्षिण के राज्यों की संख्या घट सकती है। वर्तमान में दक्षिण के पांच राज्यों के पास 129 सीटें हैं, जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार मिलाकर 120 सीटों पर हैं — लेकिन population growth के आंकड़े भविष्य में संतुलन बिगाड़ सकते हैं।
दक्षिण का सबसे बड़ा concern यह है कि उन्हें उनके responsible जनसंख्या नियंत्रण के लिए सजा मिल रही है। ये राज्य केंद्र की नीतियों का अच्छे से पालन करते रहे, जिसके कारण उनकी प्रजनन दर कम हुई। लेकिन अब कम आबादी के आधार पर उनकी political voice कमजोर होने का खतरा है। इसके विपरीत, जहां जनसंख्या तेजी से बढ़ी, वहां more seats मिलने की संभावना है।
प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया है कि किसी राज्य को loss नहीं होगा और सभी को proportional लाभ मिलेगा। एक सुझाव है कि हर राज्य की सीटों में 50 प्रतिशत तक की increase की जाए। लेकिन विपक्ष और दक्षिणी राज्यों के मुख्यमंत्री इस पर skeptical व्यक्त कर रहे हैं। उनका मानना है कि ऐसा करने से संसद का आकार बहुत बड़ा हो जाएगा और जनसंख्या के सिद्धांत को नकारा जाएगा।
इस प्रक्रिया के लिए संवैधानिक संशोधन जरूरी है, जिसके लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत चाहिए। वर्तमान राजनीतिक climate में यह आम सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण है। इसके अलावा, महिला आरक्षण अधिनियम 2023 को भी परिसीमन से जोड़ा गया है — जिसका अर्थ है कि जब तक नई सीमाएं तय नहीं होतीं, तब तक महिलाओं को आरक्षित सीटें नहीं मिल सकतीं। यह न केवल एक legal मुद्दा है, बल्कि लोकतंत्र की health का भी प्रश्न है।
एक और बात जो दक्षिण की चिंता को बढ़ाती है — वह है कर योगदान। दक्षिण की 20 फीसदी आबादी केंद्र को अधिक revenue देती है, लेकिन यदि उनका प्रतिनिधित्व कम होता है, तो नीतियां सिर्फ उत्तर के हित में बनेंगी। यह क्षेत्रीय असंतुलन को गहरा करेगा और संघीय trust को कमजोर करेगा। पिछले 25 सालों से दक्षिण के राज्य इस प्रक्रिया का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि इस खेल में उनकी स्थिति weaker है।
दक्षिण को जनसंख्या नियंत्रण के लिए सजा मिल रही है? यह बहुत unfair अन्याय है। जो राज्य जिम्मेदारी से काम करते हैं, उन्हें इनाम मिलना चाहिए, न कि नुकसान।
उत्तर के राज्यों में आबादी ज्यादा है, तो सीटें भी ज्यादा होनी चाहिए। यह democracy लोकतंत्र का बुनियादी सिद्धांत है। क्या दक्षिण अपनी आबादी कम होने का फायदा उठाकर अब अधिकार मांग रहा है?
हम ज्यादा tax कर देते हैं, लेकिन प्रतिनिधित्व कम मिलेगा? तो भविष्य में केंद्रीय नीतियां हमारे खिलाफ ही बनेंगी। यह बस एक economic risk आर्थिक जोखिम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा है।
महिला आरक्षण को परिसीमन से क्यों जोड़ा गया? यह बस एक delay tactic टालमटोल है। जनता को उनका right अधिकार तुरंत मिलना चाहिए।
अगर संविधान में संशोधन होता है, तो क्या यह संघीय ढांचे को कमजोर करेगा? मुझे डर है कि केंद्र की शक्ति और बढ़ेगी।
सरकार कह रही है कि किसी को नुकसान नहीं होगा। लेकिन गणित कैसे बनेगा? साधारण गणित कहता है कि अगर आबादी आधार है, तो दक्षिण की सीटें कम होंगी। आश्वासन कागज पर अच्छे लगते हैं।