अरविंद केजरीवाल रिक्यूजल मामला: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस अभय ओका से जानिए क्या कहता है कानून
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से अपने आबकारी नीति मामले में सुनवाई से हटने का अनुरोध किया है। इससे एक गहन legal issue उठ खड़ा हुआ है: क्या किसी न्यायाधीश की ‘प्रथम दृष्टया’ टिप्पणी ही उनके लिए मामले से अलग होने का पर्याप्त आधार होनी चाहिए? इस जटिल सवाल पर पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस अभय ओका ने अपने विचार साझा करते हुए कहा कि कानून अभी भी इस मामले में fully clear नहीं है। उन्होंने बताया कि न्यायाधीशों के लिए तुच्छ आरोपों को नजरअंदाज कर मामले में बने रहना एक आवश्यक judicial tolerance का हिस्सा हो सकता है।
जस्टिस ओका ने रिक्यूजल के दो प्रकार बताए: पहला, voluntary rule , जहां न्यायाधीश खुद चुनते हैं कि वे किसी वकील या जूनियर जज के मामले नहीं सुनेंगे। दूसरा, हितों का टकराव, जब न्यायाधीश का खुद का या परिवार का किसी पक्ष से लेना-देना होता है। उन्होंने कहा कि न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि दिखना भी चाहिए। लेकिन अगर कोई वादी खुले पैन में आरोप लगाकर न्यायाधीश को embarrass करे, तो यह न्याय प्रणाली के लिए खतरनाक है। बेहतर तरीका यह है कि वादी मुख्य न्यायाधीश के पास जाए, ताकि आधिकारिक रिकॉर्ड में आशंका दर्ज हो सके।
उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘प्रथम दृष्टया’ राय अंतिम नहीं होती। न्यायाधीश अंतरिम सुनवाई के दौरान ऐसी टिप्पणियां करते हैं ताकि वकील अपनी सर्वश्रेष्ठ दलीलें रख सकें। अगर न्यायाधीश की किसी पुराने मामले में राय को आधार बनाकर उन्हें हटाया जाए, तो न्यायिक कार्य प्रभावित होगा। ओका ने चेतावनी दी कि राजनीतिक मामलों में जजों को अत्यधिक cautious रहना चाहिए। वे ऐसे कार्यक्रमों में नहीं जाना चाहिए जहां उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठे। उनका मानना है कि सेवानिवृत्ति के बाद तो जाना ठीक है, लेकिन पद पर रहते हुए ऐसे political platforms से दूरी बनाए रखनी चाहिए।
जब कोई निराधार आरोप लगता है, तो न्यायाधीश के पास अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का विकल्प होता है, लेकिन ऐसा करते ही उन्हें मामले से हटना पड़ता है। ओका का सुझाव है कि न्यायाधीशों को show tolerance चाहिए और ‘मैं नहीं हट रहा हूं’ कहकर मामले में बने रहना चाहिए। उनका कहना है कि न्यायपालिका की गरिमा कोई भावनात्मक मामला नहीं, बल्कि एक solid ground पर टिकी होनी चाहिए। उन्होंने रिक्यूजल के लिए कोई कानून बनाने के विचार को खारिज किया, क्योंकि यह न्यायाधीश के विवेक पर निर्भर करता है।
हालांकि, उन्होंने एक बेहतर प्रणाली का सुझाव दिया: बॉम्बे और कर्नाटक हाईकोर्ट की तरह रोस्टर के साथ ही एक आदेश जारी किया जाए कि अगर बेंच नंबर 1 हटती है, तो मामला स्वतः बेंच नंबर 2 के पास चला जाए। इससे मुख्य न्यायाधीश के व्यक्तिगत हस्तक्षेप की गुंजाइश कम होगी। ओका ने कहा कि इस तरह की प्रणाली personal bias को कम करने में मदद करती है और यही न्यायिक प्रणाली के लिए सर्वश्रेष्ठ है।
अगर हर बार कोई आरोप लगाकर जज को शर्मिंदा कर सकता है, तो फिर court proceedings अदालती कार्यवाही कैसे चलेगी? जस्टिस ओका ने सही कहा।
लेकिन अगर जज किसी राजनीतिक रैली में हिस्सा ले, तो उसकी impartiality निष्पक्षता पर सवाल क्यों न उठे?
‘प्रथम दृष्टया’ राय तो बस एक शुरुआती विचार होता है। उसे आधार बनाकर हटना overreaction अतिप्रतिक्रिया है।
कोई कानून नहीं है तो फिर मापदंड क्या है? सब कुछ personal discretion व्यक्तिगत विवेक पर? यह खतरनाक लगता है।
अगर न्यायाधीश खुद को हटा लें, तो वकील को new hearing नई सुनवाई के लिए तैयार होना पड़ता है। यह समय और लागत बढ़ाता है।
स्वतः स्थानांतरण वाली प्रणाली बहुत अच्छा विचार है। इससे transparency पारदर्शिता आएगी और पक्षपात कम होगा।