होर्मुज बंद: क्या खाड़ी देशों के पास है वाकई कोई प्लान B?
जब दुनिया के सबसे अहम waterway का रास्ता बंद हो जाए, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था की धड़कन धीमी पड़ जाती है। होर्मुज, जहां से रोजाना लगभग दो करोड़ barrel कच्चा तेल और दुनिया के 20 प्रतिशत तरलीकृत प्राकृतिक गैस का परिवहन होता है, अब युद्ध के कारण बेहद संकुचित हो गया है। जहाजों की संख्या नाटकीय ढंग से कम हो गई है, और टैंकर operators का भरोसा अभी तक बहाल नहीं हुआ। यह सिर्फ तेल की बात नहीं—हीलियम, यूरिया, और ऊर्जा के अहम घटक भी इसी रास्ते जाते हैं।
अब तक के दशकों भर के प्रयास सिर्फ paper योजनाएं थीं। लेकिन अब पहली बार वैकल्पिक पाइपलाइनों की असली test चल रही है। सऊदी अरब की पेट्रोलाइन पाइपलाइन, जिसकी क्षमता 70 लाख बैरल प्रतिदिन है, अपनी पूरी क्षमता से दूर है क्योंकि यनबू के terminal उतनी गति से संभाल नहीं पाते। इसके अलावा, ईरानी ड्रोन हमलों ने अप्रैल में एक पंपिंग स्टेशन को निशाना बनाया, जिससे आपूर्ति ठप हो गई—हालांकि अरामको ने तीन दिन में मरम्मत कर राहत दी।
संयुक्त अरब अमीरात की एडकॉप पाइपलाइन, जो 20 लाख बैरल प्रतिदिन की क्षमता रखती है, खाड़ी से सीधे हिंद महासागर में निकलती है—एकमात्र बड़ा alternative रास्ता। लेकिन मार्च में फुजैरा पर हमलों ने भंडारण टैंकों में आग लगा दी और loading बंद हो गया। इराक और कुवैत की स्थिति और भी गंभीर है। इराक के 34 लाख बैरल प्रतिदिन के निर्यात में से सिर्फ 2.5 लाख बैरल उत्तरी पाइपलाइन से जा रहे हैं। कुवैत ने तो फोर्स मेजर लागू कर दिया है—यानी अनुबंधों को अस्थायी रूप से रोक दिया गया है।
कतर के लिए तेल नहीं, बल्कि एलएनजी सबसे बड़ी चिंता है। उसकी 7.7 करोड़ टन वार्षिक एलएनजी उत्पादन क्षमता दुनिया में सबसे बड़ी है, और यह पूरी तरह होर्मुज पर निर्भर है। ईरान ने भी जास्क बंदरगाह तक एक 10 लाख बैरल क्षमता वाली पाइपलाइन बनाई, लेकिन प्रतिबंध और अधूरे terminal के कारण यह भी अपनी क्षमता के नीचे चल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह संकट लंबा खिंचता है, तो वैश्विक महंगाई में तेजी आ सकती है।
अमेरिका, चीन, भारत और यूरोप के पास रणनीतिक oil reserves हैं, जिन्हें आपात में खोला जा सकता है। लेकिन ये भंडार सिर्फ अस्थायी राहत दे सकते हैं। वैकल्पिक मार्ग सिर्फ 35 से 55 लाख बैरल तेल की ढुलाई कर पा रहे हैं—आवश्यकता के मुकाबले यह अभी भी काफी कम है। जब तक होर्मुज नहीं खुलता, तब तक दुनिया एक भू-राजनीतिक जलडमरूमध्य के खतरे में जी रही है।
इतने बड़े अर्थव्यवस्था पर एक छोटे रास्ते का इतना असर? यह तो डरावना है।
क्या भारत के पास पर्याप्त आपातकालीन oil reserves तेल भंडार हैं? हमारी निर्भरता कम करने की जरूरत है।
हर बार संकट आता है तो पता चलता है कि हमारी ‘योजनाएं’ सिर्फ paper कागजी होती हैं।
ईरान ने जो पंपिंग स्टेशन तबाह किया, उसकी मरम्मत सिर्फ तीन दिन में? वाकई अरामको की तकनीक अद्भुत है।
हम सिर्फ तेल के बारे में सोचते हैं, लेकिन यूरिया और हीलियम का परिवहन भी रुका है। यह खेती और स्वास्थ्य पर भी असर डालेगा।
एलएनजी के लिए कोई विकल्प नहीं? कतर की स्थिति वाकई नाजुक है।
जब तक नई पाइपलाइनें नहीं बनतीं, हम जलडमरूमध्य के दया पर हैं।
फोर्स मेजर घोषित करने के बाद कुवैत क्या करेगा? कानूनी रूप से वे बच तो गए, लेकिन विश्वास कैसे वापस पाएंगे?