प्रेम का दीया या जनता की पीड़ा: जूली का सरकार पर हमला
मेवाड़ की धरती पर एक बार फिर राजनीति के तार बज उठे हैं। केलवाड़ा के परशुराम वाटिका में नेता प्रतिपक्ष opposition के नेता टीकाराम जूली ने जनसुनवाई के मंच से सीधे आमजन से dialogue साधा, और यह संवाद सिर्फ समस्याओं को सुनने तक नहीं रुका। यहां से सत्तारूढ़ भजनलाल सरकार पर सीधे निशाना साधा गया। जूली ने कहा कि सरकार busy है — प्रेम का दीया जलाकर भजन करने में, जबकि जनता बुनियादी facilities के लिए संघर्ष कर रही है। यह तस्वीर ने न सिर्फ राजनीतिक अंतर को उजागर किया, बल्कि जनता के दर्द को public के मंच पर लाया।
जनता ने अपनी पीड़ा बिना छिपाए रखी। लाखेला तालाब में होटलों का waste छोड़े जाने का आरोप लगाया गया, जबकि sewage की बदहाली ने लोगों का जीवन असहनीय बना दिया है। anger केवल पानी तक ही सीमित नहीं था — रोडवेज बसों के संचालन पर भी सवाल उठे। क्या सरकार नीतियों के नाम पर यातायात के अधिकार को भी भूल गई है? हर सवाल एक शासन के विफलता की कहानी सुना रहा था।
टीकाराम जूली ने न सिर्फ सुना, बल्कि तुरंत कार्रवाई का संकेत दिया। मौके पर ही विकास अधिकारी मांगीलाल गुर्जर को phone कर त्वरित action के निर्देश दिए। यह प्रतीकात्मक गति दिखाने की कोशिश थी — विपक्ष सिर्फ आवाज उठाने वाला नहीं, बल्कि जवाबदेही का दबाव बनाने वाला बल भी है। यह नाटकीय तत्व नहीं, बल्कि political उपस्थिति की घोषणा थी।
इसके बाद कर्मचारियों के मुद्दे ने भी चिंगारी भड़काई। सफाई कर्मचारियों को contractor द्वारा कम wages दिए जाने को श्रमिक शोषण का उदाहरण बताया गया। चारभुजा सीएससी भवन के उद्घाटन सहित स्थानीय मुद्दों को जनहित से जोड़ा गया। जूली ने विश्वास दिलाया कि ये समस्याएं assembly में उठाई जाएंगी — और सरकार को answer देने के लिए मजबूर किया जाएगा।
इस जनसुनवाई में पूर्व विधायक गणेश सिंह परमार ने जूली का स्वागत किया, जबकि योगेंद्र सिंह परमार ने मुद्दों को detailed रखा। संगठन के कई officials और workers की उपस्थिति ने संकेत दिया कि आगे के political दौर में ये मुद्दे क्षेत्र के हर घर में गूंज सकते हैं।
अच्छा हुआ कि कोई जनता के बीच पहुंच रहा है। सरकार सिर्फ ceremonies अनुष्ठान करने में लगी है।
जूली का फोन करना दिखावा नहीं, बल्कि pressure दबाव बनाने की रणनीति है।
हमारे इलाके में तो सीवरेज लाइन टूटी पड़ी है — कोई सुनता नहीं। अब उम्मीद है।
सफाई कर्मचारियों के वेतन का मुद्दा गंभीर है। wages कम वेतन शोषण है, न कि कोई छोटी बात।
जनसुनवाई अच्छी बात है, लेकिन क्या विधानसभा में ये मुद्दे वाकई उठेंगे?
ये सब चुनाव की तैयारी है। सच में कोई बदलाव आएगा? doubt संदेह है।
जब नेता जनता के बीच आते हैं, तो लगता है कि लोकतंत्र जीवित है।