पंजाब के सांसदों का बड़ा दलबदल: जनता के साथ गद्दारी या सत्ता का खेल?
भारतीय politics में दलबदल की गंध अब इतनी आम है कि जनता इसे अवसरवाद का एक नियमित ritual मानने लगी है। लेकिन पंजाब से आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों का एक साथ भाजपा में switch करना कोई साधारण राजनीतिक उथल-पुथल नहीं, बल्कि एक ऐसी घटना है जिसने लोगों के विश्वास को गहराई से घायल किया है। ये सभी सांसद उसी पार्टी के थे जिसे पंजाब के लोगों ने विश्वास दिखाकर सत्ता में बैठाया था — एक ऐसी पार्टी जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से जन्मी थी। अब वही चेहरे, जिन्हें जनता ने सम्मान देकर parliament भेजा, उन्हीं के विश्वास के साथ खेल रहे हैं।
इनमें से एक नाम है राघव चड्ढा, जो कभी भाजपा पर गुंडों को protection देने का आरोप लगाते थे। अब वही नेता उसी पार्टी की शरण में पहुंच गए हैं। एक और नाम है अशोक मित्तल — businessman और लवली ग्रुप के संस्थापक, जिनके टर्नओवर की बात करें तो ₹850 करोड़ का आंकड़ा सामने आता है। उनके ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय की छापेमारी हो चुकी है। कई लोग मानते हैं कि व्यवसायिक साम्राज्य बचाने के लिए ही उन्होंने यह move उठाया। यह कोई राजनीतिक विचारधारा का परिवर्तन नहीं, बल्कि जरूरत के मुताबिक राजनीतिक धर्म बदलना है।
क्या यह सब केवल अवसरवाद है? शायद। लेकिन इसके पीछे एक बड़ा strategy खेल भी है। भाजपा ने operation के तहत पंजाब में भी विधानसभा चुनाव से पहले सरकार को गिराने की कोशिश शुरू कर दी है। लेकिन पंजाब वह राज्य है जहां किसानों ने कृषि कानूनों के खिलाफ ऐतिहासिक protest चलाकर सरकार को झुकने पर मजबूर किया था। यहां की जनता ने शिवसेना के बाद भाजपा के विभाजन के खेल को नाकाम करने का इतिहास रचा है। अब फिर से वही game खेला जा रहा है।
लेकिन क्या यह बार भी वही नतीजा आएगा? कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह दलबदल गैरकानूनी है, क्योंकि आम आदमी पार्टी के आधारभूत सदस्यों ने आधिकारिक तौर पर दो-तिहाई बहुमत से पार्टी छोड़ने का प्रस्ताव नहीं पारित किया। इसका अर्थ है कि राज्यसभा सदस्यता समाप्त हो सकती है। जनता का गुस्सा भी कम नहीं — कई किसान नेता खुलकर इन दलबदलुओं के खिलाफ आ चुके हैं। कहा जा रहा है कि इन लोगों को भविष्य में public के बीच जाना भी मुश्किल होगा।
एक बार फिर सवाल उठता है: क्या राजनीति में विचारधारा की जगह सिर्फ लाभ और power बची है? और क्या जनता अब उन्हीं नेताओं को चुनेगी जो उनके विश्वास के साथ गद्दारी कर चुके हैं? इस बार, भाजपा को भी कोई सीधा benefit नहीं मिलने वाला। बल्कि, कांग्रेस अपनी स्थिति मजबूत कर सकती है। यह घटना सिर्फ एक दलबदल नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के साथ एक बड़ी जांच का विषय है।
राघव चड्ढा ने भाजपा को गुंडों की पार्टी कहा था और आज वही व्यक्ति उसी के घेरे में है। क्या यह नहीं बताता कि पाखंड राजनीति की जड़ बन चुका है?
पंजाब के लोगों ने इन्हें भरोसा दिया और वे हमारे साथ गद्दारी कर बैठे। अब इन्हें कभी वोट नहीं मिलेगा।
कानून के मुताबिक, अगर पार्टी ने आधिकारिक तौर पर निर्णय नहीं लिया, तो यह दलबदल गैरकानूनी है। सदस्यता जा सकती है।
भाजपा को लगता है कि हर राज्य महाराष्ट्र है। पर पंजाब में जनता इतनी आसानी से धोखा नहीं खाएगी। यह calculation गणना गलत हो सकती है।
केजरीवाल के कुछ व्यवहार सवाल जरूर खड़े करते हैं, लेकिन इसे दलबदल का हथकंडा नहीं बनना चाहिए।
हरभजन सिंह ने क्रिकेट में नाम कमाया, पर राजनीति में उनका कोई experience अनुभव नहीं था। एक नया सफर है।
इन सांसदों को जय चंद और मीर जाफर की तरह याद किया जाएगा। इतिहास ऐसे लोगों को माफ नहीं करता।
यदि इस घटना से आप को नुकसान होता है, तो भी भाजपा को advantage फायदा नहीं मिलेगा। कांग्रेस को मौका मिल सकता है।