एक पंक्ति के खिलाफ एफआईआर: आवाजें दब रही हैं?
क्या एक पंक्ति, एक भाषण या एक टिप्पणी इतनी खतरनाक हो सकती है कि राज्य की पूरी ताकत उसे दबाने के लिए खड़ी हो जाए? state की ओर से चलाए जा रहे दमन का माहौल अब सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहा। कवियों, writers , पत्रकारों और यहां तक कि अपने ही पार्टी के सदस्यों के खिलाफ भी action की जा रही है। आस्था को ठेस पहुंचाने या सामाजिक विभेद के आरोप में एफआईआर दर्ज हो रही हैं — लेकिन क्या ईमानदार अभिव्यक्ति अब अपराध बन गई है? जब एक कवयित्री की पीड़ा की अभिव्यक्ति पर भी पुलिस रिपोर्ट दर्ज हो, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
आम आदमी पार्टी के राघव चड्ढा के मामले में यही तस्वीर दिख रही है। उन्हें पार्टी के भीतर अनुशासनात्मक कार्रवाई का शिकार बनाया गया। उन पर allegation है कि वे पार्टी का पक्ष पर्याप्त जोर से नहीं रखते। इस साधारण सी criticism पर पार्टी ने तुरंत कार्रवाई करते हुए उन्हें राज्यसभा में उप-नेता के पद से हटा दिया। इस निर्णय के पीछे कोई संवाद नहीं, कोई स्पष्टीकरण नहीं — बस एक मौन का आदेश। leadership के साथ संबंधों में आई दूरी को देखते हुए यह स्पष्ट है कि आंतरिक असहमति अब बर्दाश्त की सीमा से बाहर है।
दूसरी ओर, कांग्रेस नेता पवन खेड़ा के खिलाफ असम में भ्रष्टाचार के political आरोप लगाने पर संगीन धाराओं में मामला दर्ज किया गया। यह न केवल धमकी का संदेश है, बल्कि न्यायपालिका के बोझ को भी बढ़ाता है। जब आलोचना को अपराध घोषित किया जाए, तो लोकतंत्र की सेहत पर सवाल उठता है। क्या अब हर असहमति को दमन की आग में झोंका जाएगा? या फिर नागरिक space धीरे-धीरे सिकुड़ती जाएगी?
यह प्रवृत्ति खतरनाक है क्योंकि यह समाज के हर कोने में फैल रही है। एक कविता, एक भाषण, एक ट्वीट — अब हर अभिव्यक्ति पर नजर रखी जा रही है। भावनाओं के आहत होने का बहाना बनाकर complaint दर्ज कराना आम हो गया है। लेकिन response क्या होनी चाहिए? कलम से, न कि पुलिस स्टेशन में। जब तक हम असहमति को बातचीत के जरिये नहीं सुलझाएंगे, तब तक सहिष्णुता का आधार कमजोर होता रहेगा। इस दमन की संस्कृति को रोकना ही देश के लिए स्वस्थ भविष्य की कुंजी है।
अगर criticism आलोचना अपराध है, तो लोकतंत्र कहां रह जाएगा?
चड्ढा को हटाना तो सिर्फ शुरुआत है। अब हर कोई डर के माहौल में बोलेगा।
कविता पर एफआईआर? यह नहीं, तो और क्या बेतुका हो सकता है।
आपको लगता है कि leadership नेतृत्व को सवालों का जवाब देना चाहिए, या बस आवाजें दबानी चाहिए?
अभिव्यक्ति की आजादी तभी मायने रखती है जब विचार अलग हों। वरना यह सिर्फ एक खाली शब्द है।
क्या राजनीति में असहमति का मतलब अब विश्वासघात होगा?
हर शिकायत पर एफआईआर — क्या पुलिस के पास और काम नहीं है?
इस तरह के action कदम लोगों को नागरिक चर्चा से दूर करेंगे।