‘पंचायत’ एक्टर विनोद सूर्यवंशी बोले- गांव में जातिगत भेदभाव, मंदिर जाने की अनुमति नहीं, मां के साथ दुर्व्यवहार
अमेज़न प्राइम की लोकप्रिय वेब सीरीज़ 'पंचायत' में सचिव के रूप में अपनी impactful भूमिका के लिए जाने जाने वाले अभिनेता विनोद सूर्यवंशी ने हाल ही में एक साक्षात्कार में अपने बचपन के कठिन अनुभवों को साझा किया। उन्होंने बताया कि कर्नाटक के अपने गांव में आज भी caste-based भेदभाव जीवित है, जहां उनके परिवार को मंदिरों या अन्य लोगों के घरों में प्रवेश करने की इजाज़त नहीं है। उन्होंने कहा कि गांव में दलितों का क्षेत्र अलग है और वहां के निवासी अलगाव के साथ जीते हैं।
एक त्योहार के दौरान खाने के लिए एक होटल में जाने की घटना को याद करते हुए विनोद ने कहा कि उन्हें अपनी प्लेटें खुद धोनी पड़ी थीं और बिल भी खुद चुकाना पड़ा। emotional trauma के साथ उन्होंने कहा, 'जब त्योहार आते थे, तो मैं सोचता था कि ये आ ही क्यों रहे हैं?' उनके घर में त्योहार का जश्न केवल तभी होता था जब कोई बाहर से कुछ दे देता। यह harsh reality उनके बचपन का हिस्सा थी।
विनोद ने अपने पिता के alcoholism होने और मां के साथ दुर्व्यवहार करने के बारे में भी खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि उनके पिता राजमिस्त्री थे, लेकिन काम न मिलने पर शराब पीकर घर आते और मां को पीटते। वह उनके साथ hate नहीं करते, लेकिन उस व्यवहार को बर्दाश्त नहीं कर पाते थे। इन सभी struggles के बीच उन्होंने अपना बचपन बिताया।
मनोरंजन जगत में आने से पहले, विनोद ने जीवन यापन के लिए कई नौकरियां कीं। उन्होंने liftman का काम किया, जिसके बदले उन्हें महीने के 1,600 रुपये मिलते थे। फिर वे ऑफिस बॉय और सिक्योरिटी गार्ड बने। 12 घंटे की ड्यूटी, बारिश में भीगते जूते, छाले और लोगों की गालियां — उन्होंने सब endured । उनका कहना है कि लोग कहते हैं कोई काम छोटा नहीं होता, लेकिन वास्तविकता यह है कि समाज किसी की वैल्यू को उसके काम के level से मापता है।
अब जब वह 'जनावर', 'थामा', 'सत्यमेव जयते' और 'जॉली एलएलबी 3' जैसी फिल्मों में दिखाई दे चुके हैं, तो उनकी कहानी केवल एक अभिनेता की उत्थान की नहीं, बल्कि एक व्यवस्था के खिलाफ silent resistance की भी है। 'पंचायत' की सफलता ने उन्हें रातोंरात पहचान तो दी, लेकिन उनके अनुभव उस संघर्ष की याद दिलाते हैं जो off-screen छिपा रहता है।
इतना प्रतिभाशाली अभिनेता, और फिर भी उसके साथ ये सब? ये reality वास्तविकता सचमुच दिल तोड़ देने वाली है।
लोग कहते हैं 'काम छोटा नहीं होता', लेकिन जब तक समाज इसे सच माने, तब तक ये बस एक hollow statement खाली बयान है।
जब त्योहार पर भी खुशी नहीं होती, तो कोई बचपन कैसे सामान्य रह सकता है? ये emotional damage भावनात्मक नुकसान कभी नहीं भूलता।
लिफ्टमैन का काम? मैं भी शुरुआत में ऐसा ही काम करता था। ये नौकरियां छोटी नहीं होतीं, बस समाज उन्हें छोटा बना देता है।
क्या caste जाति आज भी इतनी गहराई से जीवित है? गांव में मंदिर तक में अलगाव? ये सच सुनकर यकीन नहीं होता।
उनके पिता ने जो किया, वो बर्दाश्त करना मुश्किल था। लेकिन उन्होंने forgiveness माफ़ करने की कोशिश की — यही तो असली ताकत है।
पंचायत सीरीज़ में वो गांव के बारे में बोलते हैं, लेकिन असल ज़िंदगी में वो खुद उसी गांव के भेदभाव का हिस्सा थे? ये irony विडंबना बहुत गहरी है।