बंगाल चुनाव: डायबिटीज मरीजों के समूह की अपनी शिकायतें, मांगें और उम्मीदें
बंगाल के diabetic patients के समूह की भी चुनाव के दौरान अपनी अलग grievances , demands और hopes हैं। राज्य में इनकी संख्या एक करोड़ से भी अधिक है, जिसमें टाइप-1 और टाइप-2 दोनों प्रकार के मरीज शामिल हैं। इस समुदाय का कहना है कि नई सरकार को उनकी समस्याओं पर serious attention देना चाहिए और इलाज की better arrangement सुनिश्चित करनी चाहिए।
कोलकाता की 31 वर्षीय रंगमंच कर्मी पामेला साधुखां, जो 14 साल की उम्र में टाइप-1 मधुमेह की शिकार हुईं, कहती हैं कि समाज में इस बीमारी को लेकर कई myths फैले हुए हैं। एक आम misconception यह है कि टाइप-1 मरीज माता-पिता नहीं बन सकते, जिसके कारण कई लोगों की शादियां तक नहीं हो पातीं। उन्होंने कहा, 'मैंने शादी की है और मेरा आठ साल का बेटा भी है। नई सरकार को इन myths को तोड़ने के लिए concrete steps उठाने चाहिए।'
आइटी पेशेवर उत्तम दास, जो खुद टाइप-1 मरीज हैं, कहते हैं कि स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए आधारभूत सुविधाएं नहीं हैं। अचानक sugar level गिरने पर glucose tablets या monitoring मशीन उपलब्ध नहीं होती। उनका सुझाव है कि स्कूली curriculum में मधुमेह को शामिल किया जाए ताकि awareness बढ़ सके।
हावड़ा के संजय दास, जो टाइप-2 मधुमेह के मरीज हैं, कहते हैं कि सरकारी अस्पतालों में दवाओं की availability और quality पर सवाल उठते हैं। वे मांग करते हैं कि हर जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज में separate clinic खोला जाए। कुछ दवाएं बहुत expensive हैं, इसलिए उनके दामों पर control की जरूरत है।
गैर-सरकारी संगठन 'डायबिटीज अवेयरनेस एंड यू' के संस्थापक सचिव इंद्रजीत मजुमदार कहते हैं कि बंगाल में गैर-संक्रामक बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। राज्य की करीब 15 प्रतिशत आबादी डायबिटीज से ग्रस्त है, जबकि कोलकाता में यह आंकड़ा 25 प्रतिशत है। उनका मानना है कि बिना गंभीर सरकारी प्रयासों के इस स्थिति पर नियंत्रण संभव नहीं है। वे अगली सरकार से effective policies की मांग करते हैं जो वास्तविक impact छोड़ सकें।
स्कूलों में बच्चों के लिए emergency support आपातकालीन सहायता का इंतजाम तो बहुत जरूरी है। मेरा भी भाई छोटा था जब उसे डायबिटीज हुआ था।
सरकारी अस्पतालों में दवाओं की कमी एक बड़ी issue समस्या है। कई बार मरीजों को बाहर से खरीदना पड़ता है।
मिथकों के कारण social pressure सामाजिक दबाव बहुत बढ़ जाता है। यह तनाव भी ब्लड शुगर को प्रभावित करता है।
पाठ्यक्रम में जोड़ना एक बेहतरीन idea विचार है। बचपन से जागरूकता हो तो भविष्य में बीमारी कम होगी।
क्लिनिक बनाने की मांग तो बहुत basic मूलभूत है। फिर भी सरकार इसे नजरअंदाज करती है।
क्या वाकई कोई राजनीतिक दल ऐसे मुद्दों पर serious action गंभीर कार्रवाई करेगा, या सिर्फ चुनाव के बहाने बातें होंगी?