बीमा है, लेकिन जेब खाली: NSO रिपोर्ट ने बेनकाब किया स्वास्थ्य झूठ
एक ग्रामीण महिला, जिसने साल भर अपनी hard-earned से प्रीमियम भरा, अस्पताल के बिस्तर पर आंसू बहा रही है। उसके पास इंश्योरेंस है, लेकिन बिल का 95 फीसदी हिस्सा फिर भी उसकी pocket से निकल रहा है। NSO की रिपोर्ट ने उस भ्रम को तोड़ दिया है जो हम सबके दिमाग में बसा है: कि स्वास्थ्य बीमा होने का मतलब है सुरक्षा। लेकिन सच यह है कि भारत में आधे से ज्यादा लोगों के पास बीमा होने के बावजूद, वे बीमारी के वक्त अपनी savings गंवा रहे हैं।
ग्रामीण इलाकों में भर्ती मरीजों को औसतन 31,000 रुपये अपनी जेब से खर्च करने पड़ रहे हैं, जो कुल मेडिकल खर्च का 95 प्रतिशत है। शहरों में यह आंकड़ा 39,000 रुपये और 83 प्रतिशत है। यह खर्च उनके इंश्योरेंस पॉलिसी के बावजूद है। इसका मतलब है कि बीमा होने के बावजूद भी मरीज burden उठा रहा है। यह बोझ इतना भारी है कि कई बार लोगों के home बिक जाते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी अस्पतालों में भर्ती होने पर खर्च मात्र 6,000 रुपये है, जबकि प्राइवेट अस्पताल में यह 50,000 रुपये तक पहुंच जाता है। यहां छिपा है वो हिडेन चार्ज जिसके बारे में एजेंट नहीं बताता। जैसे ही आप room upgrade करते हैं, डॉक्टर की फीस, ऑपरेशन और टेस्ट के खर्च भी बढ़ जाते हैं। को-पेमेंट के नाम पर 10 से 20 प्रतिशत तक बिल आपको खुद भरना पड़ता है।
कैंसर के इलाज में 60 से 75 प्रतिशत खर्च मरीज की जेब से, किडनी रोग में 80 प्रतिशत और संक्रामक रोग जैसे डेंगू या कोविड में भी 50 प्रतिशत खर्च उठाना पड़ रहा है। इसके बजाय, फ्रांस में मरीज की जेब पर सिर्फ 9 प्रतिशत, जर्मनी में 11 प्रतिशत और जापान में 13 प्रतिशत खर्च आता है। हेल्थकेयर सिस्टम में बदलाव की जरूरत है। अब तो मरीज को सिस्टम से लड़ना पड़ रहा है, न कि बीमारी से।
एजेंट big dreams दिखाते हैं, लेकिन 'नियम और शर्तें' छिपाते हैं। हमें इस मायाजाल को तोड़ना होगा। स्वास्थ्य बीमा सचमुच सुरक्षा बने, न कि वित्तीय जाल। जब तक व्यवस्था की नीयत साफ नहीं होगी, मरीज का दर्द कम नहीं होगा। बिमारी से लड़ने के बजाय, वह इंश्योरेंस कंपनियों के रिजेक्शन से लड़ रहा है।
मेरे पिता के इलाज में भी ऐसा ही हुआ। बीमा था, लेकिन 80% खर्च मेरी pocket जेब से निकला।
एजेंट ने कहा था 'सब कवर है', लेकिन बिल आने पर पता चला कि हिडेन चार्ज था।
प्राइवेट अस्पतालों के बिलिंग प्रैक्टिस पर तुरंत नियंत्रण चाहिए।
हमारे गांव में किसान खेत बेच रहा है। क्या इंश्योरेंस सच में मदद कर रहा है?
सरकारी अस्पतालों में सिर्फ 6 हजार रुपये? यही बताता है कि निजीकरण ने क्या किया है।
फ्रांस और जापान की तरह हमारे यहां भी हेल्थकेयर सिस्टम बदलना चाहिए।
को-पेमेंट पर नियम बनने चाहिए। बीमा का मतलब होना चाहिए पूरा कवर।
सपने दिखाना आसान है, लेकिन जिम्मेदारी लेना मुश्किल।