डॉक्टरों की विदेश सैर: जनधन का इस्तेमाल या ज्ञान का विस्तार?
government डॉक्टरों की foreign यात्राओं को लेकर उत्तर प्रदेश में तूफान उठ खड़ा हुआ है। 2020 से 2025 के बीच की सभी यात्राओं का record तलब किया गया है, और आठ प्रमुख medical संस्थानों — केजीएमयू, पीजीआई समेत — को नोटिस जारी कर funding और purpose की जांच का आदेश दिया गया है। अब सवाल सीधे-सीधे पूछा जा रहा है: किसके money से ये सैर-सपाटे हुए, और मरीजों को क्या benefit मिला?
शासन के निर्देशों के बाद अफसरों में अफरातफरी मच गई है। फाइलें खोली जा रही हैं, रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं। विदेश यात्राएं आधुनिक technique और treatment पद्धतियां सीखने का जरिया होती हैं, लेकिन यहां सवाल यह है कि क्या वे ज्ञान वापस आए या फिर सिर्फ tourism बनकर रह गए? कई मामलों में तो outcome का कोई ठोस सबूत तक नहीं मिल रहा।
सबसे बड़ा आरोप यह है कि कुछ डॉक्टर दवा कंपनियों के प्रायोजन में विदेश गए — जहां उनका उद्देश्य शिक्षा कम और promotion ज्यादा रहा हो। क्या ये यात्राएं professional विकास के लिए थीं या personal लाभ के लिए? यही सवाल अब पारदर्शिता की मांग को जन्म दे रहा है।
अब किसी भी seminar , workshop या training के नाम पर विदेश जाने के लिए permission लेना अनिवार्य कर दिया गया है। यह नियम उन डॉक्टरों पर लागू होगा जो बिना approval के यात्रा कर चुके हैं। शासन का कहना है कि इससे दुरुपयोग रुकेगा और जनधन का हिसाब होगा।
अगर ये यात्राएं वाकई educational शैक्षिक थीं, तो डॉक्टर क्यों डर रहे हैं?
हमारा तो मकसद हमेशा मरीजों के लिए बेहतर care देखभाल लाना रहा है।
सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर नहीं मिलते, और वो लोग विदेश घूम रहे थे?
कंपनियों द्वारा funded फंडेड यात्राएं तो स्पष्ट स्वार्थ की गंध लिए हैं।
इजाजत का नया नियम अच्छा है, लेकिन क्या अब भी कोई छूट दी जाएगी?
कुछ यात्राओं से वाकई नई knowledge जानकारी मिली, लेकिन उसे डॉक्यूमेंट क्यों नहीं किया गया?
इस तरह की जांच से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा।