अमेरिका-ईरान वार्ता क्यों रही बेनतीजा, ट्रंप ने गिनाई एक-एक वजह
पाकिस्तान में लगभग 20 घंटे तक चली अमेरिका-ईरान वार्ता बिना किसी समझौते के खत्म हो गई, भले ही कई मुद्दों पर mutual understanding बनी थी। यह पहली बार था जब दोनों देश एक दशक से अधिक समय बाद सीधे बातचीत कर रहे थे, और इसका उद्देश्य 40 दिनों से चल रहे संघर्ष का diplomatic solution निकालना था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे ईरान की दो मांगों के कारण असफल बताया: money और nuclear capability ।
ट्रंप ने अपने प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक सिलसिलेवार पोस्ट में कहा कि वार्ता केवल इन दो मुद्दों पर आकर stalled । उनके अनुसार, ईरान की ये मांगें अमेरिका की red lines के खिलाफ थीं। उन्होंने स्पष्ट किया, 'वे पैसा चाहते हैं और उससे भी ज्यादा, वे परमाणु चाहते हैं।' इसके साथ ही उन्होंने तेहरान को direct warning दी कि अमेरिकी सेना ईरान के बचे हुए हिस्से को भी खत्म कर देगी अगर जरूरत पड़ी।
तेहरान का नजरिया अलग है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि बातचीत तब अटकी जब उन्हें अमेरिका पर trust नहीं रहा। संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबफ ने बताया कि ईरान ने 'दूरदर्शी और सकारात्मक' प्रस्ताव रखे, लेकिन अमेरिका उनका confidence जीतने में नाकाम रहा। उन्होंने X पर लिखा, 'अमेरिका हमारे तर्क और सिद्धांतों को समझ चुका है, अब उसे तय करना है कि क्या वह हमारा विश्वास जीत सकता है या नहीं।'
वार्ता विफल होने के बावजूद ट्रंप ने कहा कि बातचीत पूरी तरह wasted नहीं गई। उन्होंने माना कि कई मुद्दों पर सहमति बनी और वार्ता का माहौल respectful बना रहा। लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि परमाणु कार्यक्रम सबसे critical मुद्दा था, जिस पर कोई एकरूपता नहीं बनी। उन्होंने ईरान के stance को गैर-समझौतावादी बताया और दोहराया कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार हासिल नहीं कर पाएगा।
वार्ता के तुरंत बाद, ट्रंप ने military pressure बढ़ाने का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि अमेरिकी नौसेना तुरंत प्रभाव से होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी करेगी और आने-जाने वाले सभी जहाजों को intercept । उन्होंने ईरान पर आरोप लगाया कि वह ग्लोबल शिपिंग को बाधित कर रहा है। इसके जवाब में, ईरानी क्रांतिकारी गार्ड ने चेतावनी दी कि जलडमरूमध्य पर उनका पूरा नियंत्रण है और किसी भी दुस्साहस का crushing response दिया जाएगा।
हर बार बातचीत शुरू होती है और same point उसी बिंदु पर अटक जाती है — परमाणु। क्या ये नाटक रुकेगा भी कभी?
ट्रंप की warning चेतावनी देखकर लगता है युद्ध की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन क्या वाकई वो जंग चाहते हैं?
ईरान का कहना है कि उन्हें trust भरोसा नहीं, लेकिन क्या अमेरिका इतिहास में कभी विश्वसनीय रहा है?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे strategic रणनीतिक मार्ग है। नाकेबंदी का मतलब तेल की global supply वैश्विक आपूर्ति पर हमला है।
क्या ये वार्ता कभी constructive रचनात्मक नतीजे दे सकती है, जब हर तरफ से hardline stance कठोर रुख है?
अमेरिका कहता है 'हम शांति चाहते हैं', लेकिन नाकेबंदी की threat धमकी देता है। इसे double standard दोहरा मापदंड नहीं तो और क्या कहेंगे?