चीनी सैटेलाइट के जरिए ईरान ने अमेरिकी ठिकानों पर रखी नजर: रिपोर्ट
फाइनेंशियल टाइम्स की एक जांच रिपोर्ट ने दावा किया है कि ईरान ने मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले की योजना बनाते समय सैटेलाइट डेटा का इस्तेमाल किया, जो एक चीनी उपग्रह 'TEE-01B' से प्राप्त किया गया था। यह उपग्रह चीन की कंपनी अर्थ आई द्वारा बनाया गया था और in-orbit delivery मॉडल के तहत ईरान को सौंप दिया गया था। इसके जरिए ईरानी सेना को ग्राउंड स्टेशन के बिना भी उच्च-रिज़ॉल्यूशन तस्वीरें हासिल करने की क्षमता मिली।
लीक हुए दस्तावेजों के अनुसार, ईरानी कमांडरों ने मार्च में हुए मिसाइल और ड्रोन हमलों के पहले व बाद में सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयर बेस, जॉर्डन के मुवाफ्फाक सल्ती एयर बेस, बहरीन में अमेरिकी फिफ्थ फ्लीट के ठिकाने और इराक के एरबिल एयरपोर्ट जैसे ठिकानों की target surveillance की। 14 मार्च को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने पुष्टि की कि प्रिंस सुल्तान बेस पर पांच एयर फोर्स रिफ्यूलिंग विमान क्षतिग्रस्त हुए थे।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह उपग्रह ईरान की सैन्य ताकत में बड़ा सुधार लाता है। यह high-resolution वाली तस्वीरें ले सकता है, जो पहले के नूर-3 उपग्रह की तुलना में काफी बेहतर है। विश्लेषक निकोल ग्राजेव्स्की के अनुसार, इससे ईरान न केवल हमले से पहले टारगेट की पहचान कर सकता है, बल्कि हमले के बाद impact assessment भी कर सकता है।
चीन ने इन आरोपों को fully rejected कर दिया है और कहा है कि ये रिपोर्टें 'बेबुनियाद' हैं। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका इसके आधार पर टैरिफ बढ़ाता है, तो चीन counter-measures उठाएगा। इस बीच, इजरायल की सेना ने दावा किया है कि उसने ईरान के कई अंतरिक्ष से जुड़े ठिकानों पर सफलतापूर्वक हमला किया है।
विश्लेषकों का कहना है कि यह घटना मिडिल ईस्ट में geopolitical tension को और बढ़ा सकती है। ईरान, चीन और रूस के बीच अंतरिक्ष क्षेत्र में सहयोग लगातार बढ़ रहा है, जो पश्चिमी देशों के लिए चिंता का विषय बन गया है। अमेरिका पहले भी चीनी सैटेलाइट कंपनियों पर विरोधी देशों को समर्थन देने के आरोप लगा चुका है, लेकिन चीन ने हमेशा इन्हें denied है।
यह सौदा लगभग 250 मिलियन युआन (36.6 मिलियन डॉलर) का था, जिसमें लॉन्च, तकनीकी सहायता और ग्राउंड कंट्रोल सिस्टम एक्सेस शामिल थे। ईरान ने इस प्रणाली के जरिए न केवल अपनी निगरानी क्षमता बढ़ाई है, बल्कि रणनीतिक कमजोरी को भी कम किया है, क्योंकि उसके अपने ग्राउंड स्टेशन पहले हमलों का शिकार हो चुके हैं। यह प्रगति दिखाती है कि छोटे देश अब उन्नत स्पेस तकनीक का इस्तेमाल कर सकते हैं, जो पहले केवल बड़ी शक्तियों के हाथ में थी।
अगर चीन वाकई इस तरह के military support सैन्य समर्थन में शामिल है, तो यह न केवल अमेरिका के लिए बल्कि पूरे एशिया के लिए खतरा है।
चीन का 'शांति का समर्थन' करने का बयान बिल्कुल hypocrisy पर आधारित लगता है। अगर वह वाकई शांति चाहता, तो ऐसे सौदों को अंजाम नहीं देता।
क्या यह सैटेलाइट वाकई high-resolution उच्च-रिज़ॉल्यूशन तस्वीरें ले सकता है? अगर हां, तो यह ईरान के लिए बहुत बड़ी तकनीकी उपलब्धि है।
इजरायल का ईरानी ठिकानों पर हमला — क्या यह escalation उन्नयन का हिस्सा है? ऐसे कदम संघर्ष को और बढ़ा सकते हैं।
36 मिलियन डॉलर में इतनी बड़ी रणनीतिक बढ़त मिल गई। यह दिखाता है कि स्पेस तकनीक अब सस्ती हो रही है।
क्या अमेरिका वाकई इसके आधार पर टैरिफ बढ़ाएगा? ऐसे आर्थिक प्रतिशोध वैश्विक बाजार को भी प्रभावित करेंगे।