ईरान के साथ PAK का 'डबल गेम': शांति वार्ता के बीच सऊदी में फाइटर जेट तैनात
क्या मध्यस्थता करने वाला देश खुद एक पक्ष के साथ खड़ा हो सकता है? पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता की मेजबानी करते हुए peace talks के प्रति अपनी छवि बनाने की कोशिश की है, लेकिन एक साथ ही उसने सऊदी अरब के खाड़ी तट पर अपनी वायुसेना की तैनाती कर दी है। यह कदम उसकी diplomatic credibility पर सवाल खड़ा कर रहा है। ईरान के सामने अब यह सवाल है कि क्या वह उसी देश के लड़ाकू विमानों पर हमला कर सकता है जो उसकी बातचीत का हिस्सा बन रहा है?
पाकिस्तान ने कहा है कि यह तैनाती पूरी तरह defensive है और सऊदी अरब को सुरक्षा में सहायता देने के लिए की गई है। लेकिन सिडनी यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के दक्षिण एशिया विशेषज्ञ मुहम्मद फैसल के अनुसार, इस move से ईरान पर अप्रत्यक्ष दबाव बनता है। सऊदी अरब पहले से ही ईरान के संभावित हमलों को लेकर अस्थिर है, खासकर अपने oil fields के संदर्भ में। पाकिस्तान की मौजूदगी उसे अतिरिक्त सुरक्षा का भरोसा दिला रही है।
हालांकि, ईरान के लिए यह स्थिति moral dilemma बन सकती है। अगर क्षेत्र में तनाव फिर से बढ़ता है, तो उसे पाकिस्तानी विमानों को निशाना बनाने के decision से पहले दो बार सोचना होगा। यह न केवल द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान पहुंचाएगा, बल्कि पाकिस्तान की मध्यस्थता की पूरी process को भी खतरे में डाल सकता है। विश्लेषकों को शक है कि क्या ईरान को पहले से इस तैनाती के बारे में जानकारी थी।
इस बीच, सोशल मीडिया पर आधारित पर्यवेक्षकों ने उत्तरी खाड़ी में PAF के transport aircraft और ईंधन भरने वाले टैंकर देखे, हालांकि लड़ाकू विमान नहीं दिखे, शायद क्योंकि उनके ट्रांसपोंडर बंद थे। सऊदी रक्षा मंत्रालय ने इस तैनाती की पुष्टि की और कहा कि इससे दोनों देशों के बीच military coordination मजबूत होगा।
कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कदम सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों के लिए एक test case हो सकता है। वे अपनी रक्षा साझेदारी में विविधता लाना चाहते हैं। गल्फ इंटरनेशनल फोरम की निदेशक दानिया थाफर के अनुसार, बहरीन जैसे देश भी भविष्य में पाकिस्तान से सुरक्षा सहायता के बारे में सोच सकते हैं। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि हर खाड़ी देश इस रास्ते पर नहीं चलेगा—कतर, उदाहरण के लिए, तुर्की के साथ अपने संबंधों को प्राथमिकता देता है।
ये डबल गेम खेलना खतरनाक हो सकता है। एक तरफ शांति की बात करना और दूसरी तरफ किसी के साथ मिलकर तैनाती करना—public trust जन भरोसा कैसे बनेगा?
खाड़ी देश अमेरिकी निर्भरता कम करना चाहते हैं। पाकिस्तान के लिए यह economic opportunity आर्थिक अवसर हो सकता है, लेकिन क्षेत्रीय जटिलता भी बढ़ेगी।
ईरान के लिए यह strategic risk रणनीतिक जोखिम है। अगर पाकिस्तानी विमान नुकसान का शिकार हुए, तो पाक-ईरान संबंधों में दरार आ सकती है।
मजेदार है कि जब अमेरिकी उपराष्ट्रपति आए तो F-16 ने उनकी एस्कॉर्ट की, और ईरानी प्रतिनिधि के लिए JF-17 उड़ा। यही तो double game डबल गेम है।
सऊदी अरब को तेल ढांचे के लिए air cover हवाई ढंग से सुरक्षा चाहिए। यह तैनाती उसी जरूरत को पूरा कर रही है। क्या गलत है?
अगर यह तैनाती वाकई रक्षात्मक है, तो ईरान को इससे क्यों concern चिंता होनी चाहिए? क्या यह सिर्फ एक संकेत है?