जब न्यायाधीश ने कहा 'मेरी जिंदगी में पहली बार...', तो क्यों बढ़ गया राजनीतिक तापमान?
दिल्ली हाईकोर्ट की न्यायाधीश जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने एक ऐसी टिप्पणी की है जो न सिर्फ न्यायिक दुनिया में गूंज रही है, बल्कि राजनीतिक मैदान में भी चर्चा का विषय बन गई है। जब पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आबकारी नीति मामले में उनसे recusal request की मांग की, तो उन्होंने कहा, "मेरी जिंदगी में पहली बार किसी ने मुझसे ऐसा कहा है।" यह बयान तो व्यक्तिगत था, लेकिन इसके पीछे एक बड़ा हितों का टकराव का सवाल छिपा है — विशेषकर केजरीवाल के आरोपों के बाद कि न्यायाधीश का अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद (ABAP) से वैचारिक संबंध हो सकता है, जिसे आरएसएस से जोड़ा जाता है।
इस घटना ने न्यायिक impartiality की अवधारणा को फिर से चुनौती दी है। केजरीवाल ने गुहार लगाई कि उनके मामले में केवल पांच मिनट की hearing में निचली अदालत के बरी करने के आदेश को पलट दिया गया — जबकि उन्होंने तीन महीने तक इस पर विस्तृत दलीलें दी थीं। उन्होंने आशंका जताई कि क्या उन्हें fair trial । यह आवेदन न सिर्फ कानूनी प्रक्रिया की परख करता है, बल्कि राजनीतिक सत्ता और न्यायपालिका के बीच तनाव को भी उजागर करता है।
जस्टिस शर्मा का करियर निश्चित तौर पर प्रभावशाली है। दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में स्नातक के बाद, उन्होंने 1991 में कानून की डिग्री हासिल की और बाद में जिला अदालतों में मजिस्ट्रेट से लेकर सत्र न्यायाधीश तक के पदों पर रहीं। उन्होंने 2022 में हाईकोर्ट की पट्टी संभाली। लेकिन उनकी पहचान सिर्फ एक न्यायाधीश की नहीं है — वे लेखिका भी हैं। उनकी पुस्तकें, जैसे 'डोंट ब्रेक आफ्टर ब्रेक-अप', 'बियॉन्ड बागबान' और 'तुम्हारी सखी', सामाजिक मुद्दों जैसे अविवाहित महिलाओं की चुनौतियों, बुजुर्गों के अकेलेपन और महिला empowerment पर केंद्रित हैं।
उनके फैसले भी सामाजिक संवेदना को दर्शाते हैं। एक बलात्कार मामले में उन्होंने कहा कि झूठे आरोपों से भी public trust कमजोर होता है और निर्दोषों के जीवन में अमिट घाव छोड़ देते हैं। एक अन्य मामले में, जहां एक गृहिणी के घरेलू योगदान को नजरअंदाज किया गया, उन्होंने स्पष्ट किया कि एक गृहिणी 'बेकार नहीं बैठती' — वह ऐसा invisible labor करती है जो कमाने वाले के काम को संभव बनाता है। फर्जी दस्तावेज मामले में उन्होंने कहा कि ऐसे रैकेट देश की अंतरराष्ट्रीय reputation को नुकसान पहुंचाते हैं।
यही वजह है कि केजरीवाल का आरोप न्यायिक तटस्थता के विश्वास को चुनौती देता है। लेकिन दूसरी ओर, न्यायाधीश शर्मा के फैसलों में एक स्पष्ट मानवीय दृष्टिकोण झलकता है, जो न सिर्फ कानून की पुस्तक से, बल्कि जीवन के अनुभव से भी लिया गया लगता है। अब सवाल यह है कि क्या एक न्यायाधीश की वैचारिक पृष्ठभूमि उनके judgment को प्रभावित कर सकती है, या क्या न्यायिक प्रक्रिया स्वयं इस तरह के आरोपों को संतुलित करने की क्षमता रखती है।
पांच मिनट में सुनवाई और तीन महीं के बाद बरी करने के आदेश को उलट देना — यह due process कानूनी प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ लगता है।
न्यायाधीश ने 'गृहिणी बेकार नहीं बैठती' कहा — बहुत बड़ी बात। यह social recognition सामाजिक मान्यता की कमी को उजागर करता है।
ABAP का RSS से जुड़ाव है, लेकिन क्या यह किसी जज की impartiality निष्पक्षता पर सीधे सवाल उठाता है? सबूत कहां हैं?
लेकिन उनके फैसले तो स्पष्ट रूप से मानवीय मूल्यों पर आधारित लगते हैं। क्या यही justice न्याय नहीं होना चाहिए?
केजरीवाल ने पहले कई बार न्यायपालिका को चुनौती दी है। क्या यह भी एक political tactic राजनीतिक रणनीति है?
अगर आम आदमी को भी इतना legal pressure कानूनी दबाव झेलना पड़े, तो हमारी प्रणाली में कुछ गड़बड़ है।