बेडरूम के रास्ते राजनीति? मैथिली ठाकुर ने पप्पू यादव के बयान पर क्यों कहा — 'हम माफ नहीं कर पाएंगे'
एक टिप्पणी ने फिर से छेड़ दी है बिहार की राजनीतिक धरती पर आग। निर्दलीय सांसद पप्पू यादव के उस बयान ने, जिसमें उन्होंने कहा कि women 'नेताओं के रूम में जाए बगैर' राजनीति नहीं कर सकतीं, महिला नेताओं के गुस्से का सैलाब ला दिया है। बीजेपी की विधायिका और लोकगायिका मैथिली ठाकुर ने इसे 'अभद्र टिप्पणी' बताया और कहा कि इससे महिलाओं के dignity पर आघात पड़ा है। उन्होंने पूछा, 'हम कितना बुरा महसूस कर रहे होंगे?' जब आपकी पहचान, आपकी मेहनत, आपके संघर्ष को एक झटके में नकार दिया जाए, तो गुस्सा स्वाभाविक है।
मैथिली ठाकुर ने याद किया कि उनके पिता ने उन्हें राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया, लेकिन इसके साथ एक सवाल भी उठाया—'मेरे माता-पिता मेरी safety को लेकर क्या सोचेंगे?' उनके लिए राजनीति सिर्फ सत्ता नहीं, बल्कि समाज के लिए कुछ करने की mission थी। उनका मानना है कि हर युवा चाहता है कि वह राजनीति में आकर कुछ बड़ा कर दिखाए। लेकिन पप्पू यादव के बयान ने उसी aspiration को धूमिल कर दिया। उन्होंने कहा, 'मैं नहीं सोचती कि यदि वे माफी मांगें भी, तो हम उन्हें माफ कर पाएंगे।'
पप्पू यादव ने अपने बयान पर कोई पछतावा नहीं जताया। उल्टे, उन्होंने दावा किया कि 90 प्रतिशत महिलाएं उनकी बात से सहमत हैं। उन्होंने कहा कि वे किसी का नाम नहीं ले रहे थे, बल्कि सामान्य टिप्पणी कर रहे थे। लेकिन यही सामान्यीकरण उनके बयान को और भी खतरनाक बनाता है—क्योंकि यह पूरी महिला आबादी को एक अपमानजनक ढांचे में बांध देता है। बिहार राज्य महिला आयोग ने उन्हें नोटिस भेजा है, लेकिन वे अपने रुख पर कायम हैं। यह वही सांसद हैं जिन्होंने कहा था कि राजनीति में महिलाओं का रास्ता 'बेडरूम के route ' से शुरू होता है।
ठाकुर ने न सिर्फ पप्पू यादव को निशाना बनाया, बल्कि कांग्रेस पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि विपक्ष पहले ही महिला आरक्षण विधेयक में संशोधन के खिलाफ मतदान करके अपनी सच्चाई बेनकाब कर दी। यदि पप्पू यादव माफी नहीं मांगते, तो यह उनकी असंवेदनशीलता का एक और प्रमाण होगा। इस बयान के खिलाफ सिर्फ ठाकुर ही नहीं बोलीं—बिहार की पूर्व मंत्री श्रेयसी सिंह, संगीता कुमारी, अनामिका सिंह पटेल और अनामिका पासवान ने भी आलोचना की है। एक बयान जो राजनीतिक हाशिये पर लड़ी जा रही महिलाओं की dignity पर सवाल उठाता है, वह सिर्फ एक टिप्पणी नहीं, बल्कि एक संदेश है—और वह संदेश खतरनाक है।
मैथिली ठाकुर की आवाज़ उस महिला जगत की आवाज़ है जो मेहनत, संघर्ष और आत्मसम्मान से आगे बढ़ रही है। उनका संगीत उनकी पहचान था, लेकिन अब राजनीति में उनकी आवाज़ उससे भी ज़्यादा गूंज रही है। एक ऐसी आवाज़ जो न सिर्फ विरोध करती है, बल्कि सवाल भी पूछती है—क्या राजनीति में महिलाओं के लिए सिर्फ एक path होना चाहिए? क्या उनकी सफलता को लगातार एक कहानी में फंसाया जाए जो उनकी मेहनत को नकार दे? यह संघर्ष पुराना है, लेकिन अब इसकी आवाज़ नई है।
90% का दावा करना बेबुनियाद है। क्या किसी ने survey सर्वेक्षण किया है इसके लिए?
मैथिली जी ने सही कहा। महिलाएं संघर्ष करके आगे आती हैं। ये बयान उनके effort परिश्रम का मजाक उड़ाता है।
राजनीति में आचरण का स्तर कहाँ जा रहा है? क्या अब हर बहस bedroom बेडरूम पर टिकेगी?
महिला आरक्षण विधेयक पर विपक्ष का रुख वाकई सवालिया है। क्या वे वाकई support समर्थन करते हैं?
पप्पू यादव ने कुछ गलत नहीं कहा। बहुत सी महिलाएं ऐसे ही आती हैं।
महिलाओं की इज्जत के लिए लड़ना हर नागरिक की जिम्मेदारी है।
राजनीति में आने वाली हर महिला को इस तरह के बयानों का सामना करना पड़ता है। यह mental मानसिक दबाव बहुत बड़ा होता है।
लोकगायिका से विधायक तक का सफर अद्भुत है। मुझे उम्मीद है कि उनकी आवाज़ सुनी जाएगी।