बिना सामाजिक और आर्थिक न्याय के कोई भी कानून अधूरा रहेगा: पप्पू यादव
लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक पर हुई चर्चा के दौरान पूर्णिया के सांसद राजेश रंजन, जिन्हें पप्पू यादव के नाम से जाना जाता है, ने सरकार पर serious सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि इस बिल को लाने का तरीका लोकतंत्र की traditions के खिलाफ है। उन्होंने वर्ष 2014 की फ्री लेजिस्लेटिव काउंसिल पॉलिसी का reference देते हुए बताया कि किसी भी विधेयक को कम से कम 30 दिन के लिए सार्वजनिक परामर्श के लिए रखा जाना चाहिए, लेकिन इस संवैधानिक संशोधन की प्रतियां सांसदों को सत्र के महज दो दिन पहले दी गईं।
पप्पू यादव ने pointed out किया कि न तो विशेषज्ञ समिति ने इस पर विचार किया और न ही राज्यों से कोई consultation किया गया। उन्होंने कहा कि ऐसी जल्दबाजी में लाया गया बिल लोकतांत्रिक principles के साथ खिलवाड़ है। उन्होंने कहा कि देश में महिलाओं की current स्थिति चिंताजनक है और महिलाओं के खिलाफ अपराध के आंकड़े भयावह हैं।
उन्होंने बताया कि हर साल लाखों मामले दर्ज होते हैं, लेकिन वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है क्योंकि लगभग 80 प्रतिशत मामले दर्ज नहीं होते। उन्होंने मणिपुर, नालंदा, पटना और पूर्णिया में हुई महिलाओं के खिलाफ brutal जैसी घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि ये लोकतंत्र के काले अध्याय हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार महिला safety सुनिश्चित करने में पूरी तरह विफल रही है।
सांसद ने मांग की कि महिला आरक्षण के भीतर एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग की महिलाओं के लिए अलग से reservation होना चाहिए। उन्होंने कहा कि बिना सामाजिक और आर्थिक justice के कोई भी कानून अधूरा रहेगा। केवल सामान्य वर्ग की महिलाओं को लाभ देने से वंचित वर्ग फिर पीछे रह जाएंगे।
उन्होंने चेतावनी दी कि मोदी सरकार परिसीमन और population जैसे मुद्दों को इस बिल से जोड़कर political लाभ लेने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि ऐसा करना संघीय ढांचे के लिए खतरनाक है। असली अधिकार तभी मिलेंगे जब महिलाओं को न सिर्फ सीटें मिलेंगी, बल्कि dignity और न्याय मिलेगा।
सही कहा। बिना economic आर्थिक समानता के कोई भी आरक्षण अधूरा है।
सिर्फ 30 दिन के परामर्श का नियम तोड़ना दिखाता है कि सरकार transparency पारदर्शिता को गंभीरता से नहीं ले रही।
महिला सुरक्षा पर कोई real वास्तविक योजना नहीं, बस आरक्षण का नाटक।
80% मामले दर्ज नहीं होते? ये आंकड़ा डरावना है। क्या reporting रिपोर्टिंग प्रणाली में बदलाव नहीं चाहिए?
पप्पू यादव ने सही पकड़ा — आरक्षण के भीतर आरक्षण जरूरी है, वरना फायदा फिर ऊपरी तबके तक सीमित रहेगा।
किसी भी policy नीति को समाज के सभी स्तरों को ध्यान में रखकर बनाना चाहिए।
इस बिल पर इतनी जल्दबाजी क्यों? क्या ये सिर्फ एक symbolic प्रतीकात्मक कदम है?
सरकार को महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मुद्दे पर भी ठोस action कार्रवाई दिखानी चाहिए, न कि सिर्फ आरक्षण की बात करनी चाहिए।