नीतीश कुमार ने खुद कहा: मुख्यमंत्री पद छोड़ रहा हूं, लेकिन बिहार से दूर नहीं
Thursday को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जो कहा, उसने बिहार की राजनीतिक तस्वीर में हलचल मचा दी। उन्होंने साफ कह दिया कि वह इस्तीफा देने वाले हैं — और यह नहीं कि कोई सुराग दिया, बल्कि सीधे खुद घोषणा की। दिल्ली पहुंचकर पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि वह शपथ लेने के बाद तीन-चार दिनों में पटना लौटेंगे और फिर मुख्यमंत्री पद छोड़ देंगे। ऐसा कहना, खासकर पहली बार, इसलिए भी मायने रखता है क्योंकि अब तक वह हमेशा राजनीतिक अस्पष्टता के पीछे रहे थे।
उनका कहना था कि राज्यसभा की सदस्यता लेने की इच्छा बहुत पहले से थी। इसी उद्देश्य से उन्होंने राज्यसभा चुनाव में भाग लिया। Friday को उपराष्ट्रपति के कक्ष में उन्होंने शपथ लेनी थी — और अब वह उस मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं। इससे पहले उन्होंने विधान परिषद की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया था, जो इस राजनीतिक परिवर्तन की पहली स्पष्ट चिंगारी थी।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी लटका है: बिहार का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? जब पत्रकारों ने इस पर उनकी पसंद पूछी, तो नीतीश कुमार ने सवाल टाल दिया। कोई नाम नहीं, कोई संकेत नहीं। यही अस्पष्टता अब अटकलों को बढ़ावा दे रही है। क्या जदयू के नए अध्यक्ष के तौर पर वह पार्टी पर लगातार नियंत्रण बनाए रखेंगे? क्या वह पीछे से फैसले लेते रहेंगे?
अंत में, एक बात उन्होंने स्पष्ट की: वह दिल्ली जा रहे हैं, लेकिन बिहार पर नजर बनी रहेगी। ना सिर्फ सरकार के कामकाज, बल्कि जदयू के संगठन पर भी उनकी नजर रहेगी। चौथी बार अध्यक्ष बने होने के नाते, उनके पास अब एक नया राजनीतिक आधार है। लेकिन जब तक अगले मुख्यमंत्री का नाम सामने नहीं आता, बिहार की राजनीतिक स्थिरता पर सवाल बने रहेंगे।
अब तो साफ है कि पीछे से सब चलाएंगे। इस्तीफा फॉर्मलिटी है, असली power ताकत तो वहीं रहेगी।
बिहार के विकास पर क्या असर पड़ेगा? मुख्यमंत्री बदलेंगे, लेकिन बुनियादी ढांचा तो वही रहेगा। क्या नई ऊर्जा मिलेगी सरकार को?
एक ही सवाल: क्या नीतीश जी ने अब तक किसी को उत्तराधिकारी तैयार किया है? या हर बार जैसे, फिर आखिरी पल में फैसला होगा?
दिल्ली जाएंगे, लेकिन नजर बिहार पर रहेगी? वास्तविकता यह है कि राज्यसभा में राष्ट्रीय राजनीति में खींचाव होगा। ध्यान बंटेगा, बस।
ये सब नाटक है। पहले निर्विरोध अध्यक्ष बने, अब इस्तीफा। क्या वाकई राज्यसभा जाना इतना बड़ा सपना था, या बस रणनीति है?
मैंने अपने पिताजी को कहते सुना था – नीतीश कुमार वो leader नेता हैं जो चुपचाप फैसले बदल देते हैं। आज फिर वही हो रहा है।
कोई नाम नहीं बताया? typical बिल्कुल सही। अगर कह दिया होता, तो वो सीधे मुकाबले में आ जाता। अब सब अंदाजा लगाएंगे।
इतने सालों बाद भी एक ही चेहरा सब कुछ संभाले, यह कोई लोकतंत्र नहीं है। युवा नेतृत्व को मौका कब मिलेगा?