बिहार में बीजेपी के पहले सीएम: एनसीपी ने लगाया दावा, 'जल्द बढ़ेगा असंतोष'
बिहार के इतिहास में पहली बार BJP ने अपने नेता को मुख्यमंत्री का पद सौंपा है, जब सम्राट चौधरी ने राज्यपाल के समक्ष शपथ ली। यह परिवर्तन नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद आया, जो अब राज्यसभा के सदस्य बन गए हैं। new government की घोषणा होते ही राजनीतिक तापमान बढ़ गया।
महाराष्ट्र की शरद पवार की पार्टी, एनसीपी (SP), ने तुरंत reaction दी। प्रवक्ता महेश तापसे ने कहा कि बीजेपी ने बिहार में पहली बार अपना मुख्यमंत्री दिया है, लेकिन public dissatisfaction बहुत जल्द दिखने लगेगा। उन्होंने दावा किया कि बिहार की जनता — किसान, मजदूर और महिलाएं — politically aware हैं और बीजेपी की नीतियों के प्रति आलोचनात्मक रहेंगी।
तापसे ने बीजेपी पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि बीजेपी swallows allies , जैसे अजगर करता है। उन्होंने महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के उदाहरण का जिक्र करते हुए कहा कि बीजेपी ने शिवसेना को तोड़ने के लिए शिंदे का इस्तेमाल किया। अब, उनके अनुसार, बिहार में नीतीश कुमार को दूसरा शिंदे बनाया गया है — एक ऐसा नेता जिसे आगे चलकर हटा दिया जाएगा।
उन्होंने चेतावनी दी कि बीजेपी के नेतृत्व वाली यह सरकार will fail , क्योंकि इसमें secular values की कमी होगी। उनका दावा है कि यह political posture जनता को नहीं भाएगी। इस बयान से स्पष्ट होता है कि विपक्ष बिहार में नई राजनीतिक व्यवस्था को चुनौती देने की तैयारी में है।
बीजेपी ने बहुत समय तक नीतीश को साथ रखा, लेकिन अब power shift शक्ति का संक्रमण चाहती थी। क्या चौधरी उतने अनुभवी हैं?
एनसीपी को यह डर है कि अगर बीजेपी बिहार में अकेले govern effectively प्रभावी ढंग से शासन कर ले, तो उनकी अपनी राजनीति खतरे में पड़ जाएगी।
किसान और मजदूर वाकई aware जागरूक हैं। लेकिन क्या आलोचना सिर्फ विरोध के लिए है, या real concern वास्तविक चिंता है?
महाराष्ट्र में शिंदे के साथ जो हुआ, वह बिहार में नीतीश के साथ दोहराया जा रहा है। history repeats इतिहास दोहराता है, बस।
क्या बीजेपी के पास inclusive policy समावेशी नीति है? या फिर यह सिर्फ symbolic change प्रतीकात्मक बदलाव है?
इतनी जल्दी dissatisfaction असंतोष कैसे आ गया? सरकार तो अभी-अभी बनी है। अतिशीघ्र निर्णय क्यों?