बिहार में BJP का 'नो सरप्राइज’ ही सरप्राइज, सम्राट चौधरी को लेकर यूं हटकर चली नई चाल
भारतीय राजनीति में ‘surprise ’ शब्द का जितना रचनात्मक इस्तेमाल बीजेपी ने किया है, उतना शायद किसी जादूगर ने भी नहीं किया होगा। फर्क बस इतना है कि जादूगर टोपी से खरगोश निकालता है, और बीजेपी पर्ची से मुख्यमंत्री। लेकिन बिहार में सम्राट चौधरी पहले से ही टोपी के बाहर थे। और यह सब हुआ पर्यवेक्षक बनाकर भेजे गए शिवराज सिंह चौहान के सामने, जो मध्यप्रदेश के बाद खुद एक ‘surprise ’ के शिकार हो चुके थे। तो क्या बिहार में कोई जादू नहीं हुआ? ऐसा लगता है कि इस बार कोई सरप्राइज नहीं हुआ — पर रुकिए... यही तो सरप्राइज था।
पिछले कुछ सालों में बीजेपी ने मुख्यमंत्री चयन को एक तरह की political puzzle बना दिया है। जिस नाम की थाली सब सजाते हैं, पार्टी उसे उलटकर कुछ और ही परोस देती है। धीरे-धीरे एक मुहावरा बन गया: ‘जिसका नाम सबसे ज्यादा चले, समझो उसका टिकट कटा।’ लेकिन बिहार में कहानी थोड़ी अलग हुई। यहां पार्टी ने सम्राट चौधरी को आगे बढ़ाकर अपनी ही ‘सरप्राइज की परंपरा’ पर हल्का ब्रेक लगा दिया। यानी इस बार सरप्राइज यह था कि कोई सरप्राइज नहीं हुआ। जब अमित शाह ने बिहार में कहा था कि ‘आप सम्राट जी को जीता दीजिए, मोदी जी इन्हें बड़ा आदमी बना देंगे’, तो सबने समझ लिया था — और आज ठीक वैसा ही हुआ। वे डिप्टी सीएम और होम मिनिस्टर से अब सीएम पद पर पहुंच चुके हैं।
पिछले चुनावों में बीजेपी ने मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में ‘surprise package ’ खोलकर विश्लेषकों की नींद उड़ा दी। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की जगह मोहन यादव को सीएम बनाया गया। राजस्थान में वसुंधरा राजे के बाद भजनलाल शर्मा, छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साय — सबने अनुमानों को धता बता दिया। ओडिशा में मोहन चरण माझी का चयन भी उसी pattern का हिस्सा था: कम चर्चित चेहरा, बड़ा पद। यहां तक कि दिल्ली में भी ‘संगठन को चेहरे से ज्यादा’ महत्व देकर रेखा गुप्ता को आगे बढ़ाया गया। संदेश साफ था: व्यक्ति नहीं, प्रयोग महत्वपूर्ण है।
लेकिन बिहार का फैसला इस पृष्ठभूमि में और भी दिलचस्प है। जब सम्राट चौधरी का नाम आया, तो लोगों ने पहले तो इसे ‘अफवाह’ समझा — क्योंकि आज की बीजेपी में ऐसा नहीं होता। आमतौर पर डिप्टी सीएम और होम मिनिस्टर जैसे पदों पर रहने वाला नेता सीएम के लिए दावेदार होता है, और बीजेपी में ऐसे दावेदार को पहले तो खारिज कर दिया जाता है। लेकिन जब ठीक वही हुआ जो सोचा गया था, तो राजनीतिक दुनिया को झटका लगा। और उस झटके को और तेज कर दिया शिवराज सिंह चौहान की मौजूदगी ने — वही नेता जो खुद ‘surprise ’ के शिकार हुए, और अब बिहार में एक ‘normal ’ चयन का गवाह बने।
सम्राट चौधरी की नियुक्ति के पीछे कई राजनीतिक गणित छिपे हैं। कुशवाहा (कोइरी) समुदाय से आने वाले चौधरी के जरिए बीजेपी ने ‘लव-कुश’ यानी कुर्मी-कोइरी वोट बैंक में पैठ बनाने का संकेत दिया है, जो नीतीश कुमार का प्रभाव क्षेत्र रहा है। साथ ही, पार्टी गैर-यादव ओबीसी वोटों को एकजुट कर आरजेडी के MY समीकरण का जवाब तैयार करना चाहती है। उनका संगठनात्मक अनुभव और आक्रामक राजनीतिक शैली उन्हें चुनावी और प्रबंधन दोनों स्तरों पर उपयोगी बनाती है। यह फैसला बीजेपी की ‘सवर्ण पार्टी’ वाली छवि को तोड़ने और ओबीसी नेतृत्व को आगे बढ़ाने की strategy का हिस्सा भी है।
यानी, बीजेपी का ‘सरप्राइज मॉडल’ भी अब एक पैटर्न बन चुका है। कभी चौंकाकर संदेश देती है, तो कभी बिना चौंकाए भी एक बड़ा संकेत छोड़ जाती है। बिहार का फैसला शायद यही कहता है — ‘हम सरप्राइज दे सकते हैं, लेकिन जब चाहें तब नहीं भी देंगे... और यही असली सरप्राइज है।’ राजनीति में uncertainty ही सबसे बड़ी निश्चितता है — और बीजेपी ने इसे एक कला में बदल दिया है।
बीजेपी का सबसे बड़ा हथियार है — uncertainty अनिश्चितता. जब तक नेता खुद को सुरक्षित नहीं समझते, तब तक वफादार रहते हैं।
सम्राट चौधरी को सीएम बनाकर बीजेपी ने ओबीसी नेतृत्व को बढ़ावा तो दिया, लेकिन क्या यह सच में political inclusion राजनीतिक समावेशन है या सिर्फ चुनावी गणित?
मजे की बात यह है कि शिवराज सिंह चौहान के सामने ही ‘नॉर्मल’ फैसला हुआ। शायद उन्हें अपना ही अनुभव याद आ गया होगा।
‘जिसका नाम सबसे ज्यादा चले, समझो उसका टिकट कटा’ — यह मुहावरा अब बीजेपी के अंदर भी डर पैदा कर रहा है।
सम्राट चौधरी के जरिए बीजेपी कुशवाहा वोट बैंक पर नजर रख रही है, लेकिन क्या वे आरजेडी के मजबूत आधार को तोड़ पाएंगे?
यह फैसला न केवल बिहार के लिए है, बल्कि UP elections यूपी चुनाव के लिए भी एक संकेत है।