क्या बिहार में अब बीजेपी का युग शुरू होगा या नीतीश-लालू की विरासत जारी रहेगी?

बिहार के नए मुख्यमंत्री समरत चौधरी के नेतृत्व में राज्य की politics अब एक नए मोड़ पर खड़ी है, जहाँ सामाजिक न्याय के दावे, जातीय दावों और राजनीतिक अस्थिरता ने लंबे समय से power को एक हाथ में टिकने नहीं दिया है। लगभग बीस साल तक मुख्यमंत्री रहने के बाद नीतीश कुमार का इस्तीफा न सिर्फ एक era के अंत का संकेत है, बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि क्या अब बीजेपी का बिहार में dominance शुरू होगा?

लेकिन यह सवाल इतना सीधा नहीं है। बीजेपी और जनता दल (यूनाइटेड) की 89 और 85 विधायकों की संख्या दर्शाती है कि दोनों दल nearly equal हैं, भले ही बीजेपी सरकार में अगुआ हो। इन दलों की ideological जड़ें एक-दूसरे से बहुत अलग हैं। इतिहास गवाह है कि ये दोनों पहले भी तीन बार fell apart और फिर एक साथ आए। इसलिए उपमुख्यमंत्री के बदलाव से इन differences का अंत नहीं होगा।

नीतीश कुमार के कार्यकाल में infrastructure पर बेहतर ध्यान दिया गया — सड़कें, बिजली, स्कूल और अस्पताल सभी focus के केंद्र में थे। अत्यंत पिछड़े वर्ग (ईबीसी) और महादलित, जो मिलकर लगभग 50% मतदाताओं का गठन करते हैं, उन्हें preferential treatment दी गई। महिलाओं को भी इस दौरान अनुकूल position मिली। लेकिन यह युग 1990 में लालू प्रसाद यादव के उदय के साथ शुरू हुआ था, और नीतीश उसी movement के हिस्सा थे।

लालू के कार्यकाल ने बिहार की राजनीति में social justice की नींव रखी, जिसमें पिछड़े वर्गों ने कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती दी। 1990-91 में मंडल आयोग के implementation ने इसे मजबूत किया। नीतीश ने 2005 में बीजेपी के साथ मिलकर लालू-राबड़ी के 15 साल के शासन को replaced , लेकिन उनकी न्याय के साथ विकास की नीति में लालू के सामाजिक न्याय के सूत्र जारी रहे।

अब सवाल यह है कि क्या समरत चौधरी के नेतृत्व में बीजेपी उत्तर प्रदेश की तरह बिहार में dominant होगी? 2015 में अकेले चुनाव लड़कर बीजेपी केवल 53 सीटें जीत सकी। इसलिए यह मानना कि वह अब अकेले बहुमत जुटा सकती है, unrealistic है। समरत के अपने भीतरी challenges हैं — बीजेपी के भीतर विरोधी गुट और जेडी(यू) के भीतर नीतीश के बेटे निशांत कुमार के समर्थक।

निशांत और तेजस्वी यादव दोनों ने अपने पिताओं की राजनीतिक legacy ग्रहण की है, जो जेपी आंदोलन, राम मनोहर लोहिया और कर्पूरी ठाकुर के समाजवादी विचारों पर आधारित है। निशांत अभी अनुभवहीन हैं, लेकिन बिहार की राजनीति में कुछ भी impossible नहीं है। आने वाले दिन बताएंगे कि क्या यह बदलाव एक नए chapter की शुरुआत है या केवल एक transition

प्रतिक्रियाएँ 6

  • पटना_की_धड़कन

    नीतीश के जाने से ईबीसी और महादलित communities को सबसे ज्यादा नुकसान होगा। उनकी policies में इनके लिए असली जगह थी।

  • गंगा_तट

    बीजेपी को लगता है कि सीएम बदलने से सब कुछ बदल जाएगा। लेकिन बिहार में उनकी claim अभी भी कमजोर है। वास्तविकता यह है कि वे बिना जेडी(यू) के नहीं चल सकते।

  • जेपी_का_बेटा

    लालू और नीतीश दोनों जेपी के छात्र थे। अब उनके बेटे निशांत और तेजस्वी नई generation के नेता हैं। यह history दोहराएगा या तोड़ेगा?

  • सामाजिक_समीक्षक

    सामाजिक न्याय की बात करने वाले अब power के लिए एक-दूसरे के खिलाफ हैं। क्या यह hypocrisy नहीं है?

  • निरीक्षण

    समरत चौधरी लालू की आरजेडी से शुरुआत करने वाले हैं। क्या वह loyalty के सवाल पर खरे उतरेंगे?

  • अगला_पलटाव

    अगर निशांत कभी तेजस्वी के साथ आ जाए, तो क्या बीजेपी की dominance खत्म हो जाएगा? संभव है।

यह लेख तथ्यों पर आधारित है और अंग्रेज़ी सीखने के लिए पुनर्रचित किया गया है; पाठक प्रतिक्रियाएँ विविध दृष्टिकोणों के उदाहरण हैं।

[email protected]