ईरान हमले के बाद कहाँ गई भारतीयों की सुरक्षा की जानकारी?
28 फरवरी 2026 को ईरान पर अमेरिका और इज़रायल के संयुक्त हमले के बाद पश्चिम एशिया में तनाव एक झटके के साथ चरम पर पहुँच गया। ऐसे में खाड़ी देशों में रह रहे करोड़ों भारतीयों की safety को लेकर चिंता स्वाभाविक थी। लेकिन जब एक आरटीआई आवेदन के जरिए पूछा गया कि सरकार ने इस संकट के दौरान citizen की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए, तो विदेश मंत्रालय का जवाब सन्न कर देने वाला था—मांगी गई जानकारी उसके record में उपलब्ध नहीं है। यह जवाब न सिर्फ एक प्रशासनिक विफलता का संकेत देता है, बल्कि सरकार की पारदर्शिता को लेकर भी गहरे सवाल खड़े करता है।
नितिन राजीव सिन्हा, रायपुर निवासी और छत्तीसगढ़ कांग्रेस के आरटीआई विभाग के चेयरमैन, ने 17 मार्च को प्रधानमंत्री कार्यालय को आवेदन भेजा, जो बाद में विदेश मंत्रालय के gulf डिवीजन को स्थानांतरित हुआ। उन्होंने जानकारी मांगी कि सरकार ने किन measure के जरिए खाड़ी में भारतीयों की जान-माल की protection सुनिश्चित की, और क्या इस मुद्दे पर खाड़ी देशों के साथ कोई dialogue या पत्राचार हुआ। 15 अप्रैल को सीपीआईओ अनुराग नागर ने लिखित जवाब दिया: जानकारी available नहीं है। यह उत्तर तब भी दिया गया जब मंत्रालय ने यह दावा जारी रखा कि वह अपने विदेश mission के माध्यम से आवश्यक प्रयास कर रहा है।
लेकिन भूमि पर स्थिति अलग बताई जा रही है। कुवैत में काम कर रहे भारतीय नागरिक गुरजिंदर ने साक्षात्कार में कहा कि दूतावास की ओर से contact नहीं किया गया। 'सुरक्षा खुद ही संभालनी पड़ी,' उन्होंने कहा। उनके अनुसार, हमलों के दौरान काम बाधित होता रहा और कई बार छुट्टी घोषित कर दी जाती थी। कुवैत में रह रहे आधा दर्जन अन्य भारतीयों से किए गए conversation में भी यही बात सामने आई। सरकार के दावों और जमीनी वास्तविकता के बीच का खाई चौड़ा होता जा रहा है।
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि दुनिया भर में 1.5 करोड़ से अधिक भारतीय रहते हैं, जिनमें 66 प्रतिशत खाड़ी देशों में हैं। इनमें से अधिकांश worker निर्माण, सेवा, तेल और घरेलू क्षेत्रों में लगे हैं। ये लोग न केवल राष्ट्र के लिए प्रेषण का बड़ा स्रोत हैं, बल्कि विदेश नीति के लिए भी एक vital मुद्दा हैं। जब क्षेत्रीय तनाव बढ़ता है, तो उनकी welfare की सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन जानकारी की अनुपलब्धता के साथ, यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि क्या वास्तव में कोई आकस्मिक योजना थी, या सब कुछ अंधेरे में छोड़ दिया गया।
विदेश मंत्रालय को इस मामले पर कई सवाल भेजे गए हैं—क्या कोई औपचारिक संवाद हुआ? क्या निकासी की व्यवस्था थी? लेकिन इस रिपोर्ट तक कोई जवाब नहीं आया। एक ऐसे समय में जब भारतीय प्रवासी विश्व भर में लाखों घरों की आशा हैं, उनकी security के प्रति सरकार की उदासीनता या लापरवाही, चाहे वह दस्तावेजों के न रखे जाने में हो या संवाद की कमी में, एक गंभीर जवाबदेही का संकट पैदा करती है।
अगर रिकॉर्ड में जानकारी नहीं है, तो क्या इसका मतलब है कि कोई action कार्रवाई ही नहीं हुई? यह जवाब स्वीकार्य नहीं है।
कुवैत से बोल रहा हूँ। तनाव के दौरान कोई official आधिकारिक सूचना नहीं मिली। सब कुछ सोशल मीडिया पर निर्भर था।
यह तो स्पष्ट है कि दूतावास response प्रतिक्रिया धीमी थी। लेकिन क्या विपक्ष इसे सिर्फ राजनीति के लिए उठा रहा है?
आरटीआई के जरिए जानकारी न मिलना खुद में एक शासन संकट है। नागरिकों की सुरक्षा पर कोई रिकॉर्ड नहीं?
मेरा बेटा यूएई में काम करता है। जब खबरें आईं, तो दिल बैठ गया। सरकार को तुरंत संपर्क करना चाहिए था।
यह सवाल नहीं कि क्या कोई incident घटना हुई, बल्कि यह कि क्या तैयारी थी। तैयारी का रिकॉर्ड भी तो होना चाहिए।
सरकार कहती है कि सब कुछ ठीक है, लेकिन जब सवाल पूछो तो 'जानकारी उपलब्ध नहीं'। यही तो समस्या है।
क्या विदेश मंत्रालय ने digital डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए भारतीयों को अलर्ट भेजा? कोई ऐप या SMS?