57वें दिन: हमले जारी, बातचीत बेनतीजा?
57 दिनों से चल रहे ईरान पर america और israel के हमलों के बीच, एक तरफ कूटनीति की गुड़बुड़ाहट तेज़ है, तो दूसरी ओर अविश्वास की दीवार ऊँची होती जा रही है। ईरान के विदेश मंत्री arrival हैं pakistan , और ट्रंप प्रशासन भी अपने दूत भेज रहा है, लेकिन इन चल रही बातचीतों के बावजूद सीधा संवाद अभी भी असंभव लग रहा है। ऐसे में यह लगता है मानो दोनों पक्ष एक ही कमरे में हैं, लेकिन एक-दूसरे की ओर मुड़ने को तैयार नहीं।
ईरान के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है: कोई meeting नहीं निर्धारित है। उनके प्रवक्ता इस्माईल बकाई ने कहा कि ईरान अपने संदेश channel के ज़रिए साझा करेगा, न कि सीधे बातचीत में। यह नाजुक स्थिति दिखाती है कि कूटनीतिक भाषा में भी, विश्वास की कमी एक गहरी बाधा बनी हुई है। वहीं, ट्रंप के दूत स्टीव विटकॉफ और जैरेड कुशनर के visit के बावजूद, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस का अनुपलब्ध संकेत भी भावी कूटनीति की अनिश्चितता दिखाता है।
इसी बीच, brics उप-विदेश मंत्रियों की बैठक दिल्ली में बिना किसी joint बयान के खत्म हो गई। ईरान, जो हमलों का target है, और संयुक्त अरब अमीरात, जो जवाबी कार्रवाई के impact से ग्रस्त है, एक ही मेज पर थे — फिर भी, कोई सहमति नहीं बनी। यह न केवल इस युद्ध के प्रति मतभेद को दिखाता है, बल्कि ब्रिक्स जैसे समूह की कूटनीतिक एकजुटता पर भी सवाल खड़े करता है।
इस बीच, दक्षिणी लेबनान में इज़रायली हमले में पत्रकार अमल खलील की मौत ने international स्तर पर निंदा की लहर दौड़ा दी है। इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ प्रेस क्लब्स ने कहा कि यह कोई संयोग नहीं, बल्कि जानबूझकर किया गया हमला लगता है। उनकी मौत न केवल पत्रकारों की safety को लेकर सवाल उठाती है, बल्कि relief और बचाव कार्यों में बाधा डालने के रूप में भी देखी जा रही है।
कुल मिलाकर, यह संकट अब सिर्फ एक military टकराव नहीं रहा। यह एक जटिल जाल बन चुका है — political दबाव, कूटनीतिक खींचतान, मीडिया पर हमले, और अंतरराष्ट्रीय असहमति। ताज़ा घटनाएँ यही दिखाती हैं कि बातचीत के efforts चल रहे हैं, लेकिन समाधान की राह अभी बहुत लंबी है।
ट्रंप के दूत आ रहे हैं, लेकिन ईरान सीधे talk बात नहीं करेगा? यह लगता है मानो थिएटर चल रहा हो।
पाकिस्तान सिर्फ एक messenger दूत बनकर रह गया है। क्या वाकई यहाँ बातचीत होगी या सिर्फ रसूख दिखाने के लिए है?
पत्रकार मारे जा रहे हैं और दुनिया सिर्फ statement बयान जारी कर रही है। क्या कोई जवाबदेही होगी?
ब्रिक्स बैठक में सहमति न बन पाना दिखाता है कि क्षेत्र में balance संतुलन बिगड़ चुका है।
अमल खलील की मौत सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि पूरे पत्रकारिता व्यवसाय के लिए चेतावनी है।
57 दिन बीत चुके हैं और अभी तक कोई progress प्रगति नहीं दिख रही। क्या यह सिर्फ ताकत का प्रदर्शन है?
कूटनीति चाहे धीमी हो, लेकिन बातचीत जारी रहना थोड़ी उम्मीद तो देता है।
इस संकट का impact प्रभाव केवल ईरान तक सीमित नहीं, पूरे क्षेत्र में बढ़ता जा रहा है।