एक मृदु आवाज़, जो संसद में गूंजती है: सागरिका घोष कौन हैं?
तृणमूल कांग्रेस के political दृश्य में एक शांत, पर गहरा प्रभाव छोड़ने वाला नाम है — सागरिका घोष। न तो नारेबाज़ी में माहिर, न ही भाषणों में तीखापन रखने वाली, फिर भी उनकी उपस्थिति संसद के chambers में महसूस की जाती है। ममता बनर्जी की ओर से भेजी गई राज्यसभा की सांसद, सागरिका घोष उस ‘woman ब्रिगेड’ का हिस्सा हैं जो पार्टी के भीतर नारी शक्ति को नई identity दे रही है। लेकिन उनकी असली पहचान कहीं और बनी — पत्रकारिता के विश्व में, जहाँ उनकी लेखनी ने दो पूर्व प्रधानमंत्रियों के life को पन्नों पर उतारा।
1991 में बीबीसी से अपना career शुरू करने वाली सागरिका ने ‘क्वेश्चन टाइम इंडिया’ जैसे प्रतिष्ठित कार्यक्रमों को anchor किया। बाद में सीएनएन-आईबीएन, टाइम्स ऑफ इंडिया, आउटलुक और इंडियन एक्सप्रेस जैसे media संस्थानों में काम करने के बाद, उनकी आवाज़ भारतीय सार्वजनिक वार्ता का अहम हिस्सा बन गई। उनकी किताबें — जैसे ‘इंदिरा: इंडियाज मोस्ट पावरफुल प्राइम मिनिस्टर’ और ‘अटल बिहारी वाजपेयी’ — सिर्फ जीवनियाँ नहीं, बल्कि historical विश्लेषण के नमूने हैं। एक liberal के तौर पर, उनकी कृति ‘व्हाय आई एम ए लिबरल’ विचारधारा पर एक व्यक्तिगत प्रतिबद्धता है।
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की छात्रा रह चुकीं सागरिका, आईएएस अधिकारी की बेटी और दूरदर्शन के पूर्व महानिदेशक की संतान हैं — एक पृष्ठभूमि जो privilege और education के दरवाज़े खोलती है। फिर भी, उन्होंने अपनी voice उन मुद्दों के लिए उठाई है जो सामान्य जन को छूते हैं: पर्यावरण, प्रदूषण, और जनहित के सवाल। टीएमसी से जुड़ने के बाद, वह protest में भी दिखाई देती हैं, जहाँ उनकी मृदु उपस्थिति तीखी नीतियों के खिलाफ एक शांत विरोध की तरह लगती है।
राजनीति में आने से पहले उनके नाम कई award थे — सीएच मोहम्मद कोया पुरस्कार और भारतीय टेलीविजन अकादमी का सर्वश्रेष्ठ एंकर पुरस्कार। लेकिन आज, जब वह संसद के floor पर खड़ी होती हैं, तो वह एक journalist की नज़र से नीतियों को पढ़ती हैं। उनका विश्वास है कि जनता के interest में बोलना एक duty है, चाहे वह माइक्रोफोन के पीछे हो या संसदीय मंच पर।
सागरिका घोष का सफर — एक लेखक से लेकर सांसद तक — यह दिखाता है कि influence कभी-कभी शोर से नहीं, बल्कि thoughtful शब्दों से आता है। उनकी कलम, उनकी आवाज़, और अब उनकी राजनीतिक उपस्थिति — सभी एक ही धागे में पिरोए गए हैं: उदारता, विश्लेषण, और जवाबदेही।
दिलचस्प है कि एक पत्रकार राजनीति में कैसे आता है — क्या उद्देश्यता बनी रहती है?
उनकी किताब 'व्हाय आई एम ए लिबरल' पढ़ी है। बहुत honest ईमानदार मानसिकता है।
ममता जी ने महिलाओं को आगे बढ़ाया है, लेकिन क्या सिर्फ प्रतीकवाद है?
इंदिरा और वाजपेयी दोनों की जीवनी लिखना — यही तो challenge चुनौती है, ना?
राज्यसभा में पर्यावरण के मुद्दे उठाना बहुत ज़रूरी है। उम्मीद है वह लगातार करें।
संक्रमण पत्रकार से नेता तक आसान नहीं होता, लेकिन वह संभाल रही हैं।
मृदुभाषी होना अच्छा है, लेकिन क्या यह संसद में काम आता है?
हर महिला नेता को इतनी respect सम्मान मिलना चाहिए, चाहे वह तेज बोले या धीमे।