ब्रिक्स बैठक: भाषा पर लड़ी गई लड़ाई, सहमति नहीं बनी

नई दिल्ली में हुई ब्रिक्स उप-विदेश मंत्रियों की बैठक ने कूटनीति के एक ऐसे संकट को उजागर किया जहाँ consensus नहीं बन पाई, और बयानबाज़ी के बजाय सिर्फ discussions के आधार पर एक अध्यक्षीय वक्तव्य जारी करना पड़ा। मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका (MENA) के मुद्दों पर ब्रिक्स सदस्यों में गहरे मतभेद दिखे, विशेषकर इज़रायल-फिलिस्तीन विवाद को लेकर। भारत, जो वर्तमान में ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाल रहा है, ने statement जारी करके एक न्यूनतम सहमति का प्रयास किया, लेकिन वह एकजुट संदेश देने में विफल रहा। यह बैठक सदस्य देशों के बीच भू-राजनीतिक तनाव की गहराई को दर्शाती है।

इज़रायल की ओर से गाज़ा और लेबनान पर की गई बमबारी की आलोचना करने वाली language को नरम करने के प्रयास में भारतीय राजनयिकों को अन्य सदस्य देशों का कड़ा विरोध झेलना पड़ा। भारत ने कुछ दस्तावेज़ों में 'इज़रायल' के स्थान पर 'कब्ज़ा करने वाली शक्ति' जैसे शब्दों के प्रयोग का सुझाव दिया, जो राजनयिक रूप से अधिक तीखा था। इसके साथ ही, 'पूर्वी यरुशलम' को भविष्य के फिलिस्तीनी राज्य की राजधानी के रूप में स्वीकार करने के proposal को हटाने की कोशिश की—एक ऐसा कदम जो 2017 के बाद के भारतीय द्विपक्षीय रुख के अनुरूप था, लेकिन ब्रिक्स के व्यापक मंच पर विवाद का केंद्र बन गया।

अध्यक्षीय वक्तव्य में कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों को acknowledge किया गया, जैसे फिलिस्तीन मुद्दा, गाज़ा में मानवीय स्थिति, संयुक्त राष्ट्र राहत एवं कार्य एजेंसी (UNRWA) की role , और लेबनान में संयुक्त राष्ट्र अंतरिम बल (UNIFIL) पर हमलों की अस्वीकार्यता। ये चर्चाएँ तो हुईं, लेकिन कोई बाध्यकारी प्रतिबद्धता नहीं बनी। यह संकेत है कि ब्रिक्स एक वैचारिक मंच तो है, लेकिन action की स्पष्ट दिशा अभी कमज़ोर है।

विस्तारित ब्रिक्स के इस नए चरण में अब 10 देश—ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया और संयुक्त अरब अमीरात—शामिल हैं। सऊदी अरब को membership दी गई है, लेकिन वह अभी औपचारिक रूप से शामिल नहीं हुआ है। यह विविधता जटिलता लाती है, क्योंकि इन देशों के भू-राजनीतिक हित अक्सर टकराते हैं। ब्रिक्स के लिए अब एकजुटता बनाए रखना पहले से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है।

प्रतिक्रियाएँ 7

  • सत्यजीत_राय

    ब्रिक्स में इतने अलग-अलग देश होंगे तो consensus बनना मुश्किल ही है। कूटनीति अब ज्यादा जटिल हो गई है।

  • महिमा_जी

    भारत का रुख बदल रहा है, लेकिन क्या यह राजनयिक लाभ देगा या नहीं, यह समय बताएगा।

  • अर्जुनवीर

    UNRWA और UNIFIL जैसी एजेंसियों की role बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन क्या ब्रिक्स उनका समर्थन कर पाएगा?

  • नीलम_एम

    पूर्वी यरुशलम पर भारत का रुख बदलना चौंकाने वाला है। क्या यह अनुरूपता वास्तव में राष्ट्रीय हित में है?

  • राज_चौधरी

    अध्यक्षीय वक्तव्य? बस एक औपचारिकता। कोई action नहीं, सिर्फ शब्द।

  • साक्षी_एम

    ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के साथ इस प्लेटफॉर्म पर बात करना ही एक उपलब्धि है।

  • विक्रम_एस

    सऊदी अरब की membership अभी अधूरी है। क्या वे आखिरकार शामिल होंगे?

यह लेख तथ्यों पर आधारित है और अंग्रेज़ी सीखने के लिए पुनर्रचित किया गया है; पाठक प्रतिक्रियाएँ विविध दृष्टिकोणों के उदाहरण हैं।

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