गैस के बिना आंगनबाड़ी: बच्चे धुएं में खाते हैं, प्रशासन कहता है 'सब ठीक'
बसंतपुर के छोटे-छोटे कमरों में चूल्हे की लपटें बच्चों के चेहरों पर झुलस रही हैं। ये कोई ग्रामीण दृश्य नहीं, बल्कि आंगनबाड़ी केंद्र हैं, जहां बच्चों को पौष्टिक भोजन देने की बजाय अब वे धुएं में खाना खा रहे हैं। पिछले दो months से गैस की supply ठप है। सहायिकाएं मजबूरी में chulha पर खाना बना रही हैं, जबकि विभाग ने केंद्रों को एलपीजी गैस कनेक्शन देकर clean भोजन का वादा किया था। एक ओर प्रशासन के claims हैं कि गैस की कोई कमी नहीं है, दूसरी ओर बच्चे जहरीले धुएं में जी रहे हैं।
बसंतपुर प्रखंड के 184 आंगनबाड़ी केंद्रों को दो-दो एचपी गैस सिलेंडर दिए गए थे। लेकिन नियमित refill न होने से ये खाली पड़े हैं। केंद्र संख्या 93 और 96 में शनिवार को सहायिकाओं को चूल्हे पर खाना बनाते देखा गया। उन्हें प्रति माह केवल 1017 रुपये मिलते हैं, जो आज के समय में न तो गैस के लिए पर्याप्त है, न ही firewood के लिए। यही राशि अब दोनों के expenses के लिए इस्तेमाल हो रही है। जबकि, गैस की किल्लत के कारण लकड़ी के दाम भी बढ़ गए हैं।
स्थिति और भी चिंताजनक है क्योंकि अधिकांश केंद्र rented के छोटे कमरों में चलते हैं। बच्चों की education , पोषण भोजन और अब चूल्हे पर खाना बनाना — सब एक ही जगह हो रहा है। इससे बच्चे न केवल smoke में सांस ले रहे हैं, बल्कि उन्हें स्वस्थ वातावरण से भी वंचित किया जा रहा है। आंगनबाड़ी सेविकाओं का कहना है कि बच्चों के health पर इसका गहरा असर पड़ रहा है। ऐसे में आहार स्वच्छ और पौष्टिक होने का दावा कैसे सच होगा?
सीडीपीओ ने इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करते हुए प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी और गैस वितरक को पत्र लिखा है। पत्र में सर्वोच्च न्यायालय के उस order का जिक्र किया गया है, जो पूरक पोषाहार योजना के नियमित संचालन की मांग करता है। प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी विनय कुमार का कहना है कि जिला प्रशासन को सूचित कर दिया गया है और जल्द ही निर्देश जारी किए जाएंगे। डीपीओ अंजू कुमारी ने भी कहा कि गैस आपूर्ति restored कर दी जाएगी। लेकिन बच्चे आज भी चूल्हे के धुएं में खाना खा रहे हैं।
प्रशासन के दावे और जमीनी वास्तविकता के बीच इतना बड़ा अंतर कैसे संभव है? यह सवाल न सिर्फ बसंतपुर का है, बल्कि उन हजारों आंगनबाड़ियों का है, जहां children के अधिकार अनदेखे हो रहे हैं। गैस नहीं है, तो पोषण कैसे होगा? पोषण सिर्फ खाने का नाम नहीं, बल्कि स्वच्छता, सुरक्षा और सम्मान का भी नाम है। जब तक ये तीनों नहीं होंगे, तब तक आंगनबाड़ी केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाएगी।
हर महीने 1017 रुपये में गैस और लकड़ी, दोनों कैसे आ सकते हैं? ये बजट तो हास्यास्पद है।
मैं तो सोचता था आंगनबाड़ी में बच्चों को अच्छा खाना मिलता है। ऐसा लगता है कि हमारे यहाँ सब कुछ on paper कागजों तक सीमित है।
चूल्हे का धुआं बच्चों की सांस लेने की system प्रणाली के लिए खतरनाक है। ये तो सीधा स्वास्थ्य उल्लंघन है।
प्रशासन कहता है कोई कमी नहीं, लेकिन जमीन पर हालत बदतर है। यही विच्छेद समस्या की जड़ है।
सीडीपीओ ने सही किया पत्र लिखकर। उम्मीद है जल्द ठीक होगा।
जब तक जिम्मेदार लोग खुद आंगनबाड़ी में चूल्हा नहीं जलाएंगे, तब तक कुछ नहीं बदलेगा।