गर्मी ने मारा जेब पर: भारत की GDP, मेडिकल बिल और खाने की थाली पर असर
भारत की धरती अब बस गर्म नहीं है — वह उबल रही है। लू के झोंके सिर्फ त्वचा पर ही नहीं, बल्कि economy पर भी असर डाल रहे हैं। जहां मौसम विज्ञान विभाग (IMD) हरियाणा, दिल्ली, पंजाब, राजस्थान और बिहार जैसे इलाकों में लू को लेकर alert जारी कर रहा है, वहीं अर्थशास्त्री एक बड़े संकट की चेतावनी दे रहे हैं। अब गर्मी सिर्फ तापमान की बात नहीं रही — यह सीधे productivity घटा रही है, मजदूरों की आय कम कर रही है, और लाखों श्रम घंटे बर्बाद हो रहे हैं। हर साल, 160 बिलियन से ज्यादा काम के घंटे गर्मी की चपेट में आकर wasted हो जाते हैं।
इसका सबसे भारी प्रभाव भारत की GDP पर पड़ रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस दशक के अंत तक गर्मी से देश की economy को 2.5 से 4.5 प्रतिशत तक का नुकसान हो सकता है। और अगर कोई policy कदम नहीं उठाया गया, तो 2100 तक यह नुकसान 8.7 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। कृषि, निर्माण और शहरी अनौपचारिक क्षेत्र — ये तीनों sectors सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। बाहर काम करने वाले मजदूरों को तपती धूप में काम रोकना पड़ता है, जिससे उनकी दिन-भर की कमाई lost हो जाती है। 2021-22 में, 160 से 191 अरब श्रम घंटे नष्ट हुए — जो भारत की GDP के 5.4 से 6.3 प्रतिशत के बराबर था।
लेकिन आर्थिक नुकसान सिर्फ उत्पादकता तक सीमित नहीं है। medical खर्च भी आसमान छू रहे हैं। डॉ. नितिन जगासिया के अनुसार, गंभीर हीटस्ट्रोक के इलाज में प्रति मरीज 1 लाख से 2 लाख रुपये तक खर्च आ सकता है। यह राशि कई कामकाजी परिवारों की सालों की बचत को wipe सकती है। डॉ. मोहित माथुर के अनुसार, 40 प्रतिशत शहरी और 60 प्रतिशत ग्रामीण परिवार इलाज के लिए loan लेने या संपत्ति बेचने को मजबूर होते हैं। और इसमें बीमारी के दौरान हफ्तों तक की income का नुकसान भी शामिल नहीं है।
खाद्य सुरक्षा भी खतरे में है। FAO-WMO की रिपोर्ट कहती है कि अत्यधिक गर्मी agriculture प्रणालियों के लिए खतरा बन रही है। चावल के उत्पादन में आ रही बाधाएं प्रमुख नदी घाटियों में food सुरक्षा को प्रभावित कर सकती हैं। जब किसानों की उत्पादकता गिरती है, तो ग्रामीण बाजार लुढ़क जाते हैं, और खाद्य पदार्थों की prices बढ़ जाती हैं। यह वही लोगों की जेब पर भारी पड़ता है जो महंगाई के बीच अपनी spending की योजना बना रहे हैं।
विशेषज्ञ कहते हैं कि लू को अब सिर्फ मौसमी घटना नहीं माना जा सकता। इसके लिए public नीति की बहुस्तरीय योजना जरूरी है। इंफ्रास्ट्रक्चर में कूलिंग सुविधाओं का विस्तार, मजदूरों की सुरक्षा, और insurance पहुंच जैसे कदमों की आवश्यकता है। अगर हम अब नहीं सुधरे, तो गर्मी सिर्फ एक मौसम नहीं, बल्कि एक लगातार बढ़ता आर्थिक आपदा बन जाएगी।
हमारे गांव में तो पिछले साल ही तीन किसानों को हीटस्ट्रोक हुआ था। इलाज के लिए सबने loan कर्ज लिया।
क्या शहरों में AC बसों की संख्या बढ़ाई जा सकती है? यह इंफ्रास्ट्रक्चर का सवाल है।
गर्मी में काम रुकता है, आय कम होती है, और फिर बीमारी आती है। गरीब परिवारों के लिए यह cycle चक्र बहुत खतरनाक है।
IMD का अलर्ट आता है, लेकिन रोड पर कोई छाया नहीं। क्या सरकार policy नीतिगत कदम उठा रही है?
हम मजदूर तो बस काम छोड़कर बैठ जाते हैं। कोई नहीं पूछता कि आज खाना कहां से आएगा।
क्या हर स्कूल में ठंडे पानी की व्यवस्था है? बच्चे भी गर्मी में डिहाइड्रेटेड हो जाते हैं।
उत्पादकता घट रही है, मेडिकल बिल बढ़ रहे हैं — यह सिर्फ मौसम नहीं, एक economic आर्थिक संकट है।
दाल-चावल की कीमतें बढ़ी हैं, अब गर्मी से फसल भी प्रभावित? यह तो जेब पर सीधा वार है।