ग्वादर में चीन-पाकिस्तान क्या कर रहे कि बलोचों ने नेवी बनाकर हमले शुरू कर दिए?
पाकिस्तान के बलोचिस्तान क्षेत्र में instability और गरीबी लंबे समय से जारी है। लेकिन जब चीन ने new plan के तहत चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) के जरिए ग्वादर बंदरगाह को अपने वैश्विक व्यापार नेटवर्क का हिस्सा बनाने का फैसला किया, तो इसे पाकिस्तान के लिए एक ‘गेमचेंजर’ बताया गया। अरबों डॉलर के investment , नई सड़कें, रेल नेटवर्क और बंदरगाहों के वादे ने एक नई उम्मीद जगाई। लेकिन इसी के साथ एक नया संघर्ष भी शुरू हो गया — विकास बनाम पिछड़ापन नहीं, बल्कि identity , अधिकार और संसाधनों पर नियंत्रण का संघर्ष।
ग्वादर पोर्ट, जो बलोचिस्तान के दक्षिण में स्थित है, पूरे विवाद का केंद्र है। चीन इसे अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का key part मानता है, जहां से वह अरब सागर तक सीधी पहुंच बना सकता है। इससे चीन को मध्य पूर्व के तेल और वैश्विक व्यापार तक सीधी पहुंच मिलेगी। लेकिन स्थानीय बलोचों के लिए यह प्रोजेक्ट उनके खिलाफ लग रहा है। उनका मानना है कि उनकी जमीन ली जा रही है, उनके resources का इस्तेमाल बाहरी ताकतें कर रही हैं, और बदले में उन्हें न तो रोजगार मिल रहा है और न ही क्षेत्र का विकास।
ग्वादर, जो कभी एक शांत तटीय कस्बा था, अब भारी military presence का केंद्र बन चुका है। इससे स्थानीय लोगों में नाराजगी बढ़ गई है। CPEC के तहत ज्यादातर काम चीनी कंपनियों और इंजीनियरों को मिला, जबकि स्थानीय लोगों को सीमित अवसर मिले। इसके अलावा, पाकिस्तान का कर्ज तेजी से बढ़ा और चीन उसका सबसे बड़ा creditor बन गया। कई आलोचक इसे "डेब्ट ट्रैप" कहने लगे, जिससे बलोचिस्तान में नाराजगी और गहरी हो गई।
बलोच लिबरेशन आर्मी (BLA) जैसे संगठन लंबे समय से अलगाववादी आंदोलन चला रहे हैं। उनका आरोप है कि पाकिस्तान सरकार बलोचों के साथ भेदभाव करती है, उनकी आवाज दबाई जाती है, और forced disappearances किए जाने जैसे मामले बढ़े हैं। इसी वजह से आंदोलन हिंसक रूप लेता गया। हाल ही में BLA ने अपने नए नौसैनिक विंग हम्माल समुद्री रक्षा बल (HMDF) की घोषणा की, जो सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि strategic shift है। जिवानी में गश्ती नौका पर हमले के दावे से साफ है कि अब विद्रोह सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं रहा।
हालिया हमलों के बाद चीन ने ग्वादर से अपने कर्मचारियों को वापस बुला लिया है और ऑन-ग्राउंड ऑपरेशंस रोक दिए हैं। इससे पता चलता है कि security situation कितनी गंभीर है। पाकिस्तान ने हजारों सुरक्षाकर्मी तैनात किए हैं, लेकिन हमले जारी हैं। यह दिखाता है कि मुद्दा सिर्फ सुरक्षा का नहीं, बल्कि गहरी public anger का है। जब तक बलोचों की राजनीतिक और आर्थिक मांगों का समाधान नहीं होगा, यह संघर्ष जारी रहेगा।
जिस CPEC को पाकिस्तान की आर्थिक रीढ़ कहा जा रहा था, वही अब उसके लिए चुनौती बन गया है। कर्ज का बोझ, सुरक्षा खर्च और धीमी प्रगति ने इस पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्वादर पोर्ट, जिसे "क्राउन ज्वेल" कहा जाता था, अब तक अपेक्षित व्यापारिक गतिविधि नहीं ला पाया है। अगर इस टकराव का समाधान नहीं निकाला गया, तो यह संघर्ष और गहरा हो सकता है और समुद्र तक फैल सकता है। इससे न सिर्फ पाकिस्तान की स्थिरता प्रभावित होगी, बल्कि पूरे क्षेत्र में regional instability बढ़ सकती है।
CPEC को लेकर चीन का investment निवेश बहुत बड़ा है, लेकिन अगर सुरक्षा की स्थिति ऐसी रही तो यह नुकसानदेह हो जाएगा।
बलोचों की बात भी समझ आती है। उनकी जमीन, उनके resources संसाधन, और फिर विकास का फायदा दूसरों को?
एक तरफ विकास की बात हो रही है, तो दूसरी तरफ forced disappearances जबरन गायब होने वाले लोगों के बारे में कोई नहीं बोल रहा।
पाकिस्तान के लिए CPEC अब burden बोझ बनता जा रहा है। कर्ज, हिंसा, धीमी प्रगति — सब गलत हो रहा है।
ग्वादर में चीन की मौजूदगी बढ़ने से regional tension क्षेत्रीय तनाव में भी इजाफा होगा, खासकर भारत और अमेरिका की नजर में।
अगर स्थानीय लोगों को शामिल नहीं किया गया, तो कोई भी development project विकास परियोजना टिकाऊ नहीं हो सकती।