शांति की मेजबानी कर रहा पाकिस्तान, लेकिन सऊदी के लिए तैनात कर दिए लड़ाकू विमान: दो-धारी तलवार पर चलता राष्ट्र
पाकिस्तान, जो ईरान और अमेरिका के बीच peace talks कराने की कोशिश में लगा है, अब खुद एक जंग में घिरता दिख रहा है। इस्लामाबाद ने अमेरिका-ईरान संघर्ष को शांत करने के लिए वार्ता की मेजबानी की, लेकिन एक गुप्त defense deal के चलते उसे सऊदी अरब के पक्ष में सैन्य कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा। इसके तहत, पाकिस्तान ने अपने fighter jets सऊदी अरब के किंग अब्दुल अजीज एयर बेस पर तैनात कर दिए हैं, जबकि वहीं अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधि बातचीत कर रहे थे।
इस strategic dilemma की जड़ सऊदी अरब के साथ पाकिस्तान के 'रणनीतिक आपसी रक्षा समझौते' (SMDA) में है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस समझौते में obligation का पक्ष स्पष्ट है: अगर सऊदी अरब को खतरा हो, तो पाकिस्तान को सैन्य सहायता भेजनी होगी। लेकिन उलटा प्रावधान — सऊदी अरब का पाकिस्तान की रक्षा के लिए बाध्य होना — गायब है। यह एकतरफा security pact लगता है, जिसे पाक संसद में भी नहीं रखा गया।
इस स्थिति में पाकिस्तान पर economic pressure भी है। सऊदी अरब ने पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक में 5 अरब डॉलर से अधिक की राशि जमा कर रखी है, जो न केवल आर्थिक सहायता बल्कि political leverage का भी साधन बन गई है। इस्लामाबाद के लिए यह स्पष्ट है कि अगर ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच युद्ध escalates है और सऊदी अरब पर हमला होता है, तो पाकिस्तान को मजबूरी में युद्ध में कूदना पड़ सकता है।
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि पाकिस्तान के पास ईरान के साथ religious ties भी हैं, और उसकी बड़ी शिया आबादी ईरान के प्रति सहानुभूति रखती है। इसलिए, वह न तो सऊदी अरब को नाराज कर सकता है, न ही ईरान से दूरी बना सकता है। यह balancing act उसे दो-धारी तलवार पर चलने जैसा लग रहा है।
अब सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान वास्तव में मध्यस्थता कर सकता है, जब उसके खुद के military deployment एक पक्ष के साथ खड़े होने का संकेत दे रही है? शांति की बात करने वाला देश, अगर युद्ध में शामिल हो जाए, तो इसका regional impact गहरा होगा। पाकिस्तान की रणनीति अब न सिर्फ जोखिम भरी है, बल्कि उसकी credibility भी दांव पर लगी हुई है।
अगर वार्ता कराने वाला खुद एक पक्ष के साथ खड़ा है, तो neutrality तटस्थता कैसे बनेगी? यह तो बस एक नाटक लग रहा है।
5 अरब डॉलर का deposit जमा कितना दबाव डाल सकता है, यह समझ में आता है। आर्थिक रूप से कमजोर देशों पर ऐसा pressure दबाव बनाना आसान है।
असली सवाल यह है कि क्या ईरान इस military move सैन्य कदम को ध्यान में रखे बिना वार्ता जारी रख पाएगा? शायद नहीं।
पाकिस्तान की आबादी में शिया समुदाय भी तो है। लोग घर पर ईरान के साथ हैं, लेकिन government decision सरकारी फैसला सऊदी के साथ जा रहा है। यह internal tension आंतरिक तनाव पैदा करेगा।
शांति की बात करो और विमान भेज दो — यही आज का वास्तविक राजनीति है।
अगर यह security agreement सुरक्षा समझौता इतना महत्वपूर्ण है, तो पाक संसद में क्यों नहीं लाया गया? गुप्त रखने का मतलब है कि जनता को नहीं बताना चाहते थे।