आरा में पैकेज्ड पानी का बढ़ता जाल: स्वास्थ्य खतरे में, नियम कहां?
आरा में हर दिन दो लाख लीटर से अधिक packaged पानी बाजार में उतारा जा रहा है, लेकिन इसकी गुणवत्ता के पीछे कौन देख रहा है? जहां शहरीकरण और बढ़ती आबादी ने साफ पानी की मांग बढ़ा दी है, वहीं इस बाजार में अनियंत्रित उद्योग ने जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ शुरू कर दिया है। 100 से अधिक पानी प्लांट सक्रिय हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश के पास न तो registration है, न ही कोई लाइसेंस। ऐसे में यह पानी, जो ठंडा और साफ लगता है, असल में दूषित हो सकता है।
भारतीय खाद्य सुरक्षा मानक प्राधिकरण (FSSAI) स्पष्ट कर चुका है: हर छह महीने में पानी की testing अधिकृत प्रयोगशाला से होनी चाहिए और रिपोर्ट जमा करनी अनिवार्य है। लेकिन आरा में यह नियम केवल कागजों तक सीमित है। जिला स्तर पर authorities न तो निरीक्षण कर रहे हैं, न ही बाजार से sample लेकर जांच कर रहे हैं। एक शोध सहायक के अनुसार, होटल वाले तो जांच करवाते हैं, लेकिन प्लांट संचालक इस प्रक्रिया से avoid रहते हैं। यही लापरवाही आम आदमी को जोखिम में डाल रही है।
इतना ही नहीं, इस अनियंत्रित उद्योग ने पर्यावरण पर भी भारी दबाव डाला है। घरों से लेकर प्लांटों तक, boring की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जिससे भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि अगर भूजल का इसी तरह दोहन जारी रहा, तो आने वाला समय जल संकट से भर सकता है। नदियों और प्राकृतिक स्रोतों के संरक्षण पर भी उचित ध्यान नहीं दिया जा रहा।
लोगों को रोजाना कम से कम 10-12 गिलास साफ पानी पीना चाहिए, लेकिन यहां तो पीने का पानी ही असुरक्षित है। दूषित जल में 2000 से अधिक विषैले तत्व हो सकते हैं, जो digestion क्रिया और पोषक तत्वों के परिवहन को प्रभावित करते हैं। पेट की बीमारियां, त्वचा रोग और अन्य गंभीर बीमारियों का खतरा मंडरा रहा है। नहाने और घरेलू कार्यों में भी इस पानी के उपयोग से exposure बढ़ता है।
सरकार की योजना के तहत हर जिले में जल गुणवत्ता के लिए एक task force बननी चाहिए, लेकिन आरा में अब तक ऐसा नहीं हुआ। यह प्रशासनिक लापरवाही का साफ उदाहरण है। बिना निरीक्षण और नियमन के चल रहे इस उद्योग पर अगर तुरंत नियंत्रण नहीं लगाया गया, तो यह समस्या और भी भयावह हो सकती है। सुरक्षित पानी एक मौलिक अधिकार है, लेकिन आज वह धोखे और लापरवाही के शिकार है।
हर रोज ऑफिस में पानी के जार आते हैं। अब label लेबल देखकर भी डर लगता है कि ISI मार्क है या नहीं।
भूजल का क्षरण रुकना चाहिए। बोरिंग पर नियंत्रण नहीं हुआ तो भविष्य खतरे में है।
सरकार बड़े शहरों पर तो नजर रखती है, लेकिन छोटे जिलों में ये loophole छूट कैसे चल रही है?
बच्चे को रोज बॉटल में पानी देती हूँ। अब लगता है कि उबालकर पिलाना भी जरूरी है।
FSSAI के नियम सख्त हैं, लेकिन जमीन पर कार्यान्वयन शून्य।
क्या स्थानीय media मीडिया इस मुद्दे पर अभियान चला सकता है? जागरूकता जरूरी है।
हम तो बस वही पीते हैं जो मिलता है। जांच करने के पैसे भी नहीं हैं।
अधिकारी भी तो संसाधनों की कमी के कारण काम नहीं कर पा रहे। funding फंडिंग और ट्रेनिंग चाहिए।