बहुत कम लोगों ने सोचा होगा: यह जानी-पहचानी आदत दिल के दौरे के खतरे को दोगुना कर देती है
बहुत कम लोगों ने सोचा होगा: वह आम आदत जिसे हम रोज़मर्रा का हिस्सा मानते हैं, दिल के दौरे के risk को दोगुना कर सकती है। उच्च रक्तचाप, धूम्रपान और मधुमेह तो जाने-माने खतरे हैं, लेकिन एक अनदेखी आदत — घंटों लगातार बैठे रहना — भी उतनी ही खतरनाक साबित हो रही है। हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. संजय भोजराज ने चेतावनी दी है कि शारीरिक inactivity दिल के दौरे और स्ट्रोक का प्रमुख कारण बन रही है।
डॉ. भोजराज, जो 20 साल से भी अधिक समय से हृदय रोगों पर काम कर रहे हैं, ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में बताया कि लगातार बैठे रहने से रक्त circulation धीमा हो जाता है, रक्त शर्करा बढ़ती है और रक्त के थक्के बनने का risk बढ़ जाता है। यह सब मिलकर हृदय रोग के खतरे को गंभीरता से बढ़ाता है। उनका कहना है कि इस आदत का असर उतना ही भयावह है जितना कि धूम्रपान या उच्च कोलेस्ट्रॉल का।
वैश्विक आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने physical inactivity को दुनिया भर में गैर-संक्रामक रोगों से होने वाली मौतों का एक प्रमुख कारण बताया है। जब शरीर लंबे समय तक निष्क्रिय रहता है, तो चयापचय धीमा पड़ जाता है और वसा को तोड़ने वाले एंजाइम कम सक्रिय हो जाते हैं। इससे धमनियों में वसा जमने लगती है, जिसे एथेरोस्क्लेरोसिस कहते हैं — एक ऐसी condition जो दिल के दौरे और स्ट्रोक को न्यौता देती है।
इसका मतलब यह नहीं कि आपको हर रोज़ मैराथन दौड़नी है। डॉ. भोजराज के अनुसार, simple changes ही काफी हैं। वे हर 30 से 60 मिनट बाद उठकर थोड़ा चलने, स्क्वैट्स करने या शरीर को हिलाने-डुलाने की सलाह देते हैं। ये small steps लंबे समय में बड़े फायदे दे सकते हैं। जोखिम कम करने के लिए नियमितता ज़्यादा अहम है, न कि तीव्रता।
इस सच्चाई को समझना ज़रूरी है — आराम जीवन की ज़रूरत है, लेकिन लगातार बैठे रहना उसके विपरीत है। जब आप ऑफिस में बैठे हैं, टीवी देख रहे हैं या फोन पर स्क्रॉल कर रहे हैं, तो याद रखें: शरीर को movement की ज़रूरत होती है। यह सिर्फ एक व्यायाम की बात नहीं, बल्कि जीवनशैली के daily routine में छोटे-छोटे विराम डालने की बात है।
हर घंटे उठना मुश्किल नहीं है। मैं अपने फोन पर टाइमर लगा लेता हूँ। simple habit आदत पड़ जाए तो बहुत फर्क पड़ता है।
घर पर भी यही समस्या है। बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते, खाना बनाते-बनाते घंटों बैठे रहती हूँ। अब सोच रही हूँ कि बीच में उठकर कुछ light stretches स्ट्रेचिंग ज़रूर करूँ।
मजाक नहीं है। मेरे पिताजी को दिल का दौरा पड़ा था। डॉक्टर ने भी कहा था कि बैठे-बैठे काम और कम चलना बड़ा contributing factor कारण था।
हम तो लगातार स्क्रीन पर काम करते हैं। इस खतरे के बारे में कोई नहीं बताता। क्या कंपनियाँ भी इसके लिए workplace policy नीति बनाएंगी?
प्रकृति में निष्क्रियता नहीं होती। पेड़ भी हवा में हिलते हैं। हमें भी natural movement प्राकृतिक गति चाहिए।
इतना स्पष्ट चेतावनी के बावजूद लोग बैठे रहेंगे। क्योंकि comfort zone आराम का क्षेत्र छोड़ना मुश्किल है।