पाकिस्तान में पड़ गए खाने के भी लाले? शहबाज सरकार की इन नीतियों के खिलाफ सड़कों पर उतरे 100 से ज्यादा शहरों के किसान

पाकिस्तान में अब सिर्फ नागरिकों को ही नहीं, बल्कि अन्नदाताओं को भी food की चिंता सता रही है। शहबाज शरीफ की सरकार के खिलाफ nationwide protest के तहत, पाकिस्तान के 100 से अधिक शहरों में किसान सड़कों पर उतर आए। अंतरराष्ट्रीय किसान संघर्ष दिवस के मौके पर, 'पाकिस्तान किसान राबिता कमेटी' (PKRC) के नेतृत्व में यह आंदोलन उस गहरे agricultural crisis की ओर इशारा करता है जो देश को झकझोर रहा है।

किसानों का आरोप है कि सरकार की anti-farmer policies उनकी आजीविका के लिए खतरा बन गई हैं। उनकी मुख्य demands में गेहूं के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को 4,000 पाकिस्तानी रुपये प्रति मन बढ़ाना शामिल है। इसके साथ ही वे सरकार के corporate farming के मॉडल का विरोध कर रहे हैं, जो छोटे किसानों को हाशिए पर धकेल सकता है।

एक और बड़ी चिंता गेहूं खरीद के privatization को लेकर है, जिसके तहत इस काम को 11 निजी कंपनियों को सौंपा जाना है। किसानों का कहना है कि यह कदम उनके लिए असुरक्षा का संकेत है। इसके अलावा, बटाईदार किसानों को दिए गए eviction notices को वापस लेने की भी मांग जोरों पर है।

यह आंदोलन पाकिस्तान के चारों प्रांतों में फैला हुआ है। पंजाब के लाहौर, मुल्तान और साहीवाल से लेकर सिंध के हैदराबाद, खैबर पख्तूनख्वा के पेशावर और बलूचिस्तान के क्वेटा तक — हर जगह किसानों ने collective voice उठाई। PKRC की महासचिव रिफ्फत मकसूद ने लाहौर में कहा कि सरकार ने ग्रामीण समुदायों की neglect की है और केवल कॉर्पोरेट हितों को प्राथमिकता दी है।

किसान पहले से ही बढ़ती उत्पादन लागत, अस्थिर बाजार कीमतों और जलवायु परिवर्तन के impact से जूझ रहे हैं। अब यह आंदोलन शहबाज सरकार के लिए एक बड़ी राजनीतिक और आर्थिक challenge बन गया है। किसान समूहों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि अगर सरकार ने उनकी मांगों पर serious action , तो आंदोलन और उग्र हो सकता है।

प्रतिक्रियाएँ 6

  • सूरज_खेत

    MSP बढ़ाए बिना तो किसानों का बचना मुश्किल है। बीज, उर्वरक, डीजल के दाम बढ़े, लेकिन खरीद मूल्य नहीं — यही pressure सबकुछ तोड़ रहा है।

  • कलम_वाला

    कॉर्पोरेट खेती का मतलब है भूमि का एकाधिकार। छोटे किसानों को बाहर करने का साफ रास्ता। सरकार कहती है development , लेकिन जमीन पर यह विस्थापन है।

  • बलोच_आवाज

    क्वेटा में भी प्रदर्शन हुए, लेकिन अखबारों में खबर नहीं। पूरे बलूचिस्तान की आवाज़ को ignored किया जा रहा है।

  • अर्थ_संग

    अगर गेहूं खरीद का काम निजी कंपनियों को मिला, तो भ्रष्टाचार और बढ़ेगा। किसानों को fair price मिलना लगभग असंभव हो जाएगा।

  • नीलम_पंजाब

    लाहौर में महिलाएं भी आंदोलन में शामिल हुईं। यह सिर्फ MSP की बात नहीं, बल्कि dignity की लड़ाई है।

  • सच्ची_बात

    सरकार को लगता है कि यह केवल एक मांग है। लेकिन यह trust का सवाल है। अगर वे नहीं सुनेगी, तो अगली बार सड़कें और भीड़ बड़ी होगी।

यह लेख तथ्यों पर आधारित है और अंग्रेज़ी सीखने के लिए पुनर्रचित किया गया है; पाठक प्रतिक्रियाएँ विविध दृष्टिकोणों के उदाहरण हैं।

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