50 दिनों में 50 करोड़ बैरल तेल स्वाहा, ईरान संकट से दुनिया को ₹4.63 लाख करोड़ की चपत, बहाली में लगेंगे कई साल
ईरान पर हमले के बाद से लगभग 50 दिन बीत चुके हैं, और इस अवधि में वैश्विक energy supply पर गहरा प्रभाव पड़ा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस दौरान कच्चे तेल का production लगभग बंद हो गया, जिससे दुनिया भर में 50 करोड़ बैरल तेल की आपूर्ति गायब रही। इसका मूल्य लगभग 50 अरब डॉलर, यानी लगभग ₹4.63 लाख करोड़ आंका गया है। यह नुकसान न सिर्फ़ ऊर्जा बाजार के लिए बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।
केप्लर (Kpler) के आंकड़ों के अनुसार, हमले के बाद से वैश्विक बाजार से 50 करोड़ बैरल से अधिक कच्चा तेल और कंडेनसेट गायब हो गए हैं। यह संख्या पूरी दुनिया की 5 दिन की तेल जरूरत के बराबर है। एक विश्लेषक ने कहा कि यह नुकसान अमेरिकी सेना के 6 साल के ईंधन उपयोग के बराबर है। इससे global inflation पर भी दबाव पड़ सकता है, खासकर परिवहन और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में।
खाड़ी के देशों पर इस संकट का सबसे ज्यादा असर पड़ा है। मार्च में सऊदी अरब, कतर, यूएई और कुवैत जैसे देशों का तेल उत्पादन प्रतिदिन लगभग 80 लाख बैरल तक घट गया। जेट ईंधन के निर्यात में भी भारी गिरावट आई है। यह नुकसान अकेले न्यूयॉर्क और लंदन के बीच 20,000 राउंड-ट्रिप उड़ानों के लिए पर्याप्त ईंधन के बराबर है। ऐसे में aviation industry पर भी दबाव बढ़ना तय है।
भारत जैसे आयातक देशों के लिए भी स्थिति चिंताजनक है। यदि संकट बरकरार रहा, तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे सामान्य जनजीवन प्रभावित होगा। S&P रेटिंग्स का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत है, लेकिन लंबे समय तक तेल की ऊंची कीमतों से जीवन की लागत पर दबाव बढ़ेगा।
हालांकि, ईरान के विदेश मंत्री ने होर्मुज जलडमरूमध्य खुले रहने की बात कही है, लेकिन तेल उत्पादन और आपूर्ति को सामान्य करने में कई महीने लग सकते हैं। कुछ रिफाइनरियों और एलएनजी सुविधाओं को हुए नुकसान की मरम्मत में कई साल तक लग सकते हैं। वैश्विक ऊर्जा infrastructure की बहाली एक लंबी प्रक्रिया होगी, जिसमें निवेश, सहयोग और स्थिरता की जरूरत होगी।
50 करोड़ बैरल तेल का नुकसान सिर्फ कच्चे तेल की कीमत बढ़ाएगा, या supply chain सप्लाई चेन पर भी असर डालेगा?
ये सब बड़े आंकड़े सुनाई देते हैं, लेकिन आखिरकार आम आदमी को क्या फर्क पड़ेगा? क्या हमारे यहां भी पेट्रोल और डीजल और महंगे हो जाएंगे? जीवन की लागत तो पहले से ही बहुत ज्यादा है।
इजरायल और अमेरिका ने हमला किया, लेकिन नुकसान पूरी दुनिया को उठाना पड़ रहा है। क्या यह नहीं दिखाता कि global economy वैश्विक अर्थव्यवस्था कितनी जोखिम में है?
कई साल लगेंगे बहाली में? यानी अगले कुछ सालों तक तेल महंगा रहेगा। long-term impact दीर्घकालिक प्रभाव भारत जैसे विकासशील देशों पर ज्यादा पड़ेगा।
क्या कोई अंतरराष्ट्रीय संस्था इस crisis संकट को नियंत्रित करने के लिए कदम उठा रही है? यूएन या आईएमएफ कहां हैं?
ऊर्जा के लिए इतने निर्भर रहना ही दिक्कत बन रहा है। अब तो धीरे-धीरे renewable energy अक्षय ऊर्जा की ओर बढ़ना जरूरी हो गया है।