स्मार्ट मीटर जांच: लैब में तकनीक, लेकिन भरोसा सड़कों पर क्यों?
एक smart क्रांति का दावा करने वाला उत्तर प्रदेश अब अपने ही technology फैसलों पर सवाल खड़े कर रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर बिजली विभाग ने स्मार्ट मीटरों की तकनीकी जांच के लिए चार सदस्यीय समिति गठित की थी — और अब उसी समिति ने लखनऊ की विभागीय लैब में सैंपल मीटरों की जांच का फैसला किया है। यह जांच अप्रैल के मध्य में शुरू हुई, लेकिन अभी तक पूरी नहीं हो पाई, जबकि रिपोर्ट देने की समयसीमा पहले ही बीत चुकी है। इस देरी ने जनता के भरोसे पर एक और दरार डाल दी है।
विभाग की ओर से कहा गया है कि शनिवार को कुछ sample स्मार्ट मीटरों को तकनीकी जांच के लिए लैब भेजा गया है। यह जांच समिति की मौजूदगी में होगी, लेकिन यहीं से विवाद शुरू होता है। क्या विभागीय लैब — जो खुद बिजली विभाग के अधीन है — वाकई निष्पक्ष जांच कर पाएगी? उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने सीधा सवाल पूछा: क्या इस लैब में सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर दोनों की स्वतंत्र जांच संभव है? उनका डर है कि मीटर बनाने वाली कंपनियां और उद्योगपति जांच प्रक्रिया पर प्रभाव डाल सकते हैं।
मुद्दा सिर्फ तकनीकी नहीं है — यह शासन के विश्वास पर है। लोग पूछ रहे हैं: क्या इन मीटरों को लगाने से पहले कई स्तरों पर परीक्षण किया गया था? क्या निष्कर्ष जनता के साथ साझा किए गए? बिजली कंपनियों द्वारा अनुमोदित घटकों की गुणवत्ता और उनके स्रोत की जांच कौन करेगा? ये सवाल तभी गहराते हैं जब जनता को कोई choice नहीं दिया गया। उपभोक्ता भारत सरकार के कानून के तहत पोस्टपेड और प्रीपेड मीटर चुनने का अधिकार मांग रहे हैं।
विरोध अब सिर्फ आवाज नहीं, बल्कि सड़कों पर है। कई जिलों में विरोध प्रदर्शन जारी हैं, और protest में महिलाएं भी बड़ी संख्या में शामिल हो रही हैं। उनका कहना है कि बिना सहमति के लगाया गया मीटर उनके घरों में एक आंकड़ा नियंत्रण का उपकरण बन सकता है। तकनीकी जांच चाहे कितनी भी सख्त हो, लेकिन तब तक का भरोसा डगमगा चुका है। जनता की मांग स्पष्ट है: पारदर्शिता, जवाबदेही और एक real विकल्प।
इस पूरी प्रक्रिया पर एक अलग नजर रख रही है राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद। वे कहते हैं कि जांच समिति को निष्पक्ष रिपोर्ट देनी चाहिए, और प्रक्रिया पर उनकी monitoring जारी रहेगी। लेकिन सवाल बना हुआ है: क्या एक विभागीय लैब में घरेलू उपकरणों की जांच सचमुच निष्पक्ष हो सकती है? क्या तकनीकी त्रुटि के बजाय यह राजनीतिक या आर्थिक हितों की खेल है? जब तक जवाब नहीं मिलते, लोग इन devices को संदेह की नजर से देखते रहेंगे।
अगर लैब खुद बिजली विभाग के अधीन है, तो स्वतंत्र जांच कैसे होगी? यह तो कैसे होता है कि आप अपने खिलाफ मामला सुनें?
महिलाएं सड़कों पर क्यों उतर रही हैं? क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके household घरेलू बजट पर खतरा है। बिजली बिल तो जीवन का मुद्दा है।
सॉफ्टवेयर अपडेट के जरिए मीटर कैसे व्यवहार करेगा — यह भी जांच का हिस्सा होना चाहिए। क्या update अपडेट के बाद मीटर ज्यादा बिजली का उपयोग दिखाने लगेगा?
सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि पहले किन स्तरों पर परीक्षण हुए। क्या यह testing जांच बाहरी एजेंसी ने की थी या खुद कंपनी ने?
हर जिले में विरोध हो रहा है, फिर भी बिजली विभाग ठंढे पैरों पर। क्या तकनीक के नाम पर जबरदस्ती चलेगी?
अगर मीटर वाकई सही हैं, तो फिर इतना रहस्य क्यों? पूरी रिपोर्ट तुरंत जारी कर देनी चाहिए।
मैं तकनीक से नहीं डरता, लेकिन मुझे पारदर्शिता चाहिए। बिना विकल्प के जबरदस्ती स्मार्ट मीटर लगाना गलत है।
गोमती नगर की लैब में जांच हो रही है, लेकिन क्या वहां के यंत्र इतने सटीक हैं कि सॉफ्टवेयर गड़बड़ी पकड़ सकें?