अमेरिका ने खाड़ी देशों को 22 हजार करोड़ में बेचा था ये हथियार, ईरान के एक ही हमले में हो गया फुस्स
अमेरिका ने खाड़ी देशों को 22 हजार करोड़ रुपये में बेचा था यह उन्नत defense system , लेकिन ईरान के एक ही बड़े attack में यह पूरी तरह फेल हो गई। टर्मिनल हाई एल्टीट्यूड एरिया डिफेंस (THAAD) को दुनिया की सबसे advanced मिसाइल रोधी प्रणालियों में गिना जाता था। लेकिन हाल के घटनाक्रम ने इसकी reliability पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
THAAD का मुख्य घटक AN/TPY-2 radar है, जो दुश्मन की ballistic missile को ऊंचाई पर ही पहचानकर उसे नष्ट कर देता है। अमेरिका ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और जॉर्डन को यह प्रणाली बेची थी, जिस पर हर देश ने लगभग 22 हजार करोड़ रुपये खर्च किए। इसके अतिरिक्त, पैट्रियट सिस्टम भी लगाए गए थे, जो कम दूरी के खतरों और ड्रोन के खिलाफ कारगर माने जाते हैं।
लेकिन ईरान ने एक ही झटके में सऊदी अरब, UAE और जॉर्डन में तैनात THAAD के key रडार और बैटरी स्टेशनों को निशाना बनाया। जॉर्डन के मुवफ़्फक साल्टी एयर बेस पर लगे रडार को पूरी तरह destroyed कर दिया गया। सैटेलाइट तस्वीरों में सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयर बेस पर रडार के लिए बने शेल्टर का मलबा दिखाई दे रहा है। UAE के अल रुवैस में भी बैटरी संरचनाओं पर direct hit हुआ।
एक THAAD रडार की अकेले कीमत 2700 करोड़ रुपये (लगभग 300 मिलियन डॉलर) है। इसके बावजूद, यह प्रणाली ईरान की मिसाइलों के आगे failed रही। खाड़ी देशों को एहसास हो गया है कि वे सिर्फ अमेरिकी तकनीक पर भरोसा करके नहीं बच सकते। यह घटना उनकी security रणनीति के लिए एक बड़ी चुनौती है।
खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देश फारस की खाड़ी के आसपास स्थित हैं, जहां तेल और गैस के विशाल भंडार हैं। इसलिए यह क्षेत्र वैश्विक आर्थिक stability के लिए अहम है। अब इन देशों को न केवल अपनी रक्षा प्रणाली को upgrade करने की जरूरत है, बल्कि किसी एक तकनीक पर आश्रित न रहते हुए बहु-स्तरीय रक्षा ढांचा बनाने की आवश्यकता है।
22 हजार करोड़ का एक सिस्टम और वो भी एक हमले में फेल? ये सिर्फ पैसे का waste अपव्यय है।
अमेरिका को हर जगह अपने हथियार बेचने का जुनून है, लेकिन क्या वो उनकी असली effectiveness प्रभावशीलता भी जांचता है?
ईरान की मिसाइल तकनीक अब कमजोर नहीं रही। ये घटना warning चेतावनी है कि तकनीकी तौर पर सभी देश जल्दी पकड़ रहे हैं।
खाड़ी देशों को अब चीन या रूस से भी defense रक्षा प्रणाली लेने पर विचार करना चाहिए। एक ही स्रोत पर निर्भरता खतरनाक है।
THAAD के साथ-साथ पैट्रियट सिस्टम भी थे। फिर भी नाकाम? शायद integration एकीकरण और कमांड सिस्टम में भी खामी है।
अमेरिका के साथ डील करना अब उतना आसान नहीं रहेगा। दूसरे देश trust विश्वास करेंगे कि ये सिस्टम वाकई काम करते हैं?
एक रडार के लिए 2700 करोड़? ये तो बस धड़ल्ले से profit मुनाफा कमाने का तरीका है।
क्या अब खाड़ी देश अपने own खुद के रक्षा अनुसंधान पर निवेश बढ़ाएंगे, या फिर अगली बार किसी और के हथियार खरीदेंगे?