राहुल गांधी की दोहरी नागरिकता की सुनवाई से न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने खुद को अलग कर लिया
इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने राहुल गांधी के खिलाफ the case में एफआईआर दर्ज करने के अपने ही आदेश को लेकर खुद को the hearing से अलग कर लिया है। यह कदम तब आया है जब कोर्ट ने पहले ही एक public figure के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की संभावना जताई थी। न्यायालय ने अब फाइल को मुख्य न्यायमूर्ति के पास भेजकर नए बेंच के गठन की सिफारिश की है, जो इस मामले की आगे की legal process को निष्पक्ष बनाने में मदद कर सकता है।
इस फैसले के पीछे का कारण यह है कि न्यायमूर्ति विद्यार्थी ने अपने आदेश के finalization से ठीक पहले एक वर्ष 2014 के उच्च न्यायालय के फैसले का संज्ञान लिया, जिसमें कहा गया है कि एफआईआर दर्ज करने की मांग वाली याचिका खारिज होने पर आरोपित को नोटिस भेजना अनिवार्य है। चूंकि पहले इस मामले में ऐसा नहीं किया गया, न्यायालय ने माना कि the decision दोबारा विचार के योग्य है। इसके बाद न्यायमूर्ति ने स्वयं को सुनवाई से अलग कर लिया।
यह मामला बीजेपी कार्यकर्ता एस. विग्नेश शिशिर द्वारा दायर एक याचिका से शुरू हुआ था, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि राहुल गांधी के पास dual citizenship है। लेकिन एमपी-एमएलए कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया था, क्योंकि नागरिकता के मुद्दे पर फैसला लेने का अधिकार उसके पास नहीं है। फिर भी, हाई कोर्ट में इसकी सुनवाई शुरू हो गई, जिसने राजनीतिक और legal debate को फिर से तेज कर दिया।
अब सवाल यह है कि क्या न्यायमूर्ति विद्यार्थी का यह कदम न्यायिक integrity का प्रमाण है या दबाव में लिया गया फैसला। सुनवाई के दौरान एडवोकेट्स ने कहा था कि राहुल गांधी को नोटिस देने की need नहीं है, लेकिन न्यायालय के पास उपलब्ध कानूनी निर्णय ने इस बात को contradict कर दिया। अगली सुनवाई 20 अप्रैल को होगी, जब नया बेंच इस मामले की merits पर विचार करेगा।
अगर नियम है कि नोटिस जरूरी है, तो फिर बिना नोटिस के एफआईआर क्यों? basic fairness मूलभूत निष्पक्षता का सवाल है।
न्यायमूर्ति ने गलती मान ली, यह अच्छी बात है। accountability जवाबदेही के बिना न्यायपालिका का भरोसा कैसे बनेगा?
ये सब एक political drama राजनीतिक नाटक है। दोनों पक्ष अपने-अपने फायदे के लिए न्यायालय का इस्तेमाल कर रहे हैं।
क्या वाकई राहुल गांधी के पास दूसरी नागरिकता है? proof सबूत कहाँ है? सिर्फ आरोप लगाना काफी नहीं।
नियमों का पालन होना चाहिए, चाहे व्यक्ति कौन भी हो। कानून का शासन कमजोर नहीं पड़ना चाहिए।
हम आम लोगों को नोटिस भेजे बिना कोई कार्रवाई करने पर भड़कते हैं, लेकिन यहाँ सब कुछ double standard दोहरा मापदंड है।