जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने केजरीवाल को दिया बड़ा झटका, पहले खूब सुनाया फिर कहा- नहीं हटूंगी
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को न्यायपालिका से एक बड़ा झटका लगा है। the case में अपनी निष्पक्षता पर उठाए गए सवालों के बावजूद, जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने साफ किया है कि वह शराब घोटाले के मामले की सुनवाई जारी रखेंगी। केजरीवाल ने उनसे मांग की थी कि वह the matter से खुद को अलग कर लें, लेकिन अदालत ने इस याचिका को खारिज कर दिया। इस फैसले ने public trust पर गहरा प्रभाव डालने वाली एक बहस को जन्म दिया है।
केजरीवाल ने तीन बार जस्टिस शर्मा की अदालत में पेश होकर अपनी दलीलें रखीं। उन्होंने the demand की कि जज के बच्चों का केंद्र सरकार के वकीलों के पैनल में होना हितों के टकराव का मामला है। इसके अलावा, उन्होंने जज द्वारा आरएसएस से जुड़े संगठन के कार्यक्रम में शामिल होने पर भी सवाल उठाए। लेकिन न्यायमूर्ति शर्मा ने सभी आरोपों का समाप्त करते हुए कहा कि इनमें कोई credible evidence नहीं है, बस आशंकाएं हैं।
जस्टिस शर्मा ने अपने फैसले में कहा कि अगर वह बिना सुनवाई के मामले से हट जातीं, तो यह रास्ता आसान होता। लेकिन उन्होंने कहा कि ऐसा करने से the institution को नुकसान पहुंचता। उन्होंने जोर देकर कहा कि न्यायाधीश का पद संयम मांगता है, लेकिन मौन रहकर संस्था की गरिमा को नहीं तोड़ा जा सकता। उन्होंने कहा, 'हर आरोप न्यायपालिका की सामूहिक प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगाता है।'
इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने 27 फरवरी को केजरीवाल समेत 23 लोगों को acquitted कर दिया था और सीबीआई को जमकर फटकार लगाई थी। सीबीआई ने इस फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील दायर की, जिस पर जस्टिस शर्मा सुनवाई कर रही हैं। अब उनका यह फैसला यह दिखाता है कि न्यायाधीश दबाव में आए बिना अपनी duty करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
यह घटना न केवल एक legal battle को उजागर करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा करना कितना महत्वपूर्ण है। जब एक जनप्रतिनिधि सीधे जज की निष्पक्षता पर सवाल उठाता है, तो इसका असर सिर्फ एक मामले तक सीमित नहीं रहता। यह public confidence के स्तर को प्रभावित करता है और न्यायपालिका की भूमिका पर सवाल खड़े करता है।
अगर आरोपों में सबूत नहीं हैं, तो फिर इतना शोर क्यों? public trust जन आस्था तो इसी से डगमगाती है जब बिना तथ्यों के आरोप लगाए जाएं।
जज ने सही कहा—अगर हर मामले में जज को बदल दिया जाएगा, तो the institution संस्था कहां जाएगी? यह तो न्याय की बुनियाद को हिलाने जैसा होगा।
केजरीवाल ने खुद को वकील बनाकर बहुत अच्छी बहस की, लेकिन क्या the demand मांग करना ही कानूनी अधिकार है? सबूत कहां हैं?
यह दिखाता है कि जब तक सबूत नहीं होते, तब तक जज को अपनी duty ड्यूटी करनी चाहिए। दबाव में आकर हटना खतरनाक उदाहरण बनेगा।
एक बात साफ है—अगर वादी जज को जज कर सकता है, तो फिर कोई legal battle कानूनी लड़ाई नहीं रह जाएगी। यह बहुत खतरनाक रास्ता है।
क्या अब हर केस में जज के परिवार की नौकरी पर सवाल उठेगा? यह तो credible evidence विश्वसनीय सबूत की जगह केवल शक पर आधारित है।